Friday, December 26, 2008

गजनी तो गज़ब की है लेकिन.......

लेकिन कुछ तुक भिड़ाने के लिये फिल्म देखने जायेगें तो ज़्यादा मज़ा नहीं आयेगा। फिल्म उम्दा मनोरंजन करती है, आमिर खान के तो कहने ही क्या। आसीन ने भी कमाल की एंक्टिंग की है। मुर्गादौस का निर्देशन क़ाबिले तारीफ है। ए आर रहमान का संगीत थियेटर से बाहर निकलते ही ज़बान पर चढ़ जाता है।


फिल्म की कहानी बेहतरीन है। जिस तरह हीरो की यादाश्त 15 मिनट के बाद गायब हो जाती है ठीक उसी तरह फिल्म में कई कड़ियां पन्द्रह मिनट के बाद गायब होती नज़र आती हैं। पूरी फिल्म में तेज़ी तो है लेकिन जैसे ही गेयर चेंज होता है..सड़क भी बदल जाती है और झटका भी ज़ोर का लगता है।
आमिर खान ने तो कमाल ही कर दिया है। उनके अभिनय पर कुछ भी कहना कम होगा। बॉडी बनाने के लिये की गयी मेहनत बताती है कि आमिर अपने रोल के लिये कितने संजीदा हैं। फड़कती भुजायें, अंगारे से दहकती आंखों के साथ हुंकार आमिर के अभिनय का चरम है। दिमाग से बीमार शख्स का चेहरा कैसा होना चाहिये इस पर आमिर ने कितनी रिसर्च की है ये अभी तक सामने नहीं आया। लेकिन ये भी सच है कि आम इस फिल्म को आमिर की ही फिल्म मत समझ लीजियेगा, इस फिल्म में आमिर ने कुछ नहीं किया है, कुछ नहीं से मतलब है आमिर ने कोई दखल नहीं दिया है, फिल्म देखकर लगता है आमिर ने कहानी को पूरी तरह समझने की ज़रूरत भी नहीं समझी...फिल्म की लय ताल के महारथी आमिर इस फिल्म में केवल एंक्टिंग करते ही नज़र आयेगें। इस फिल्म में आमिर ने बिल्कुल दखल अंदाज़ी नहीं की। ये बात केवल वही समझ सकते हैं जो ये समझते हैं कि जब आमिर दखल देते हैं तो कैसा होता है। फिर भी संजय सिंघानिया कमाल का चरित्र है।

आसीन के लिये तो बस दुआयें ही निकलती है., उम्दा अभिनय किया है आसीन ने..आमिर को पूरी टक्कर दी है लड़की ने। आसीन बिल्कुल घरेलू हिन्दुस्तानी सी दिखती है लेकिन बाज़ी मार ले गयी इस फिल्म में। चटर पटर करती ये लड़की कब आपके अन्दर तक पंहुच जायेगी पता भी नहीं चलेगा, चेहरे के एक्सप्रेशन सीधे सादे लेकिन संजोये हुये हैं। डॉयलाग डिलीवरी शानदार है, इमोशनल भी कर देती है आसीन।

मुर्गादौस का निर्देशन बढि़या है। कैमरे के एंगल और बैकग्राउंड फिल्मिंग में शानदार काम हुआ है। बढिया इफ्फेक्ट देखने हों तो ये फिल्म ज़रूर देखिये। मुर्गादौस साउथ के हैं ये फिल्म देखने पर पता लग ही जाता है। ऐसा लगता है मु्र्गादौस कभी कभी नर्वस भी फील कर गये हैं। लेकिन जो भी हो बढ़िया काम हुआ है।

ए आर रहमान का म्यूज़िक उन्हीं का नेचर का है, निर्देशक भी साउथ का और संगीतकार भी साउथ का..बेहतरीन जुगलबंदी है।
अच्छी फिल्म है, मनोरंजन के लिये ज़रूर देखिये, मज़ा आयेगा। बाकी कुछ नहीं है।



दिनेश काण्डपाल

Thursday, December 4, 2008

आतंक को हमारा जवाब

लेटर भेजो, तब मिलेंगें कमांडो


चार दिसम्बर को दैनिक भास्कर ने खबर छापी है आप भी पढ़िये...........................

अफसरों के दांवपेच और लाल फीताशाही ने ताज और ओबेराय होटल में आतंकियों को खूनखराबे के लिए पूरा मौका दिया। हालात से निपटने के लिए मदद मांगी जाती रही लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था। हमले वाली रात की बिखरी छोटी-छोटी घटनाएं जोड़ने से जो तस्वीर उभरती है वो अराजकता, भ्रम और घनघोर लापरवाही की है।
उस रात जैसे कोई सरकार नहीं थी, कोई सिस्टम नहीं था, कोई जवाबदेही नहीं थी। केंद्र सरकार को मिली रिपोर्टो से पता चलता है कि हमले की गंभीरता को समझते हुए भी आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई में बार-बार अफसरी बाधाएं खड़ी की गईं।
पहले मदद की चिट्ठी भिजवाओ:हमले की रात नौसेना की पश्चिमी कमान ने बिना लिखित आग्रह के कमांडो भेजने से दो टूक इनकार कर दिया। पुलिस कमिश्नर ने चिट्ठी भेजी तो यह कहकर खारिज कर दी गई कि पत्र मुख्य सचिव का होना चाहिए। तब मुख्य सचिव को लेटर फैक्स करना पड़ा। हालांकि सरकारी नियमों के मुताबिक जरूरत पड़ने पर एक जिलाधिकारी तक सेनाओं से मदद मांग सकता है। इस दौरान राज्य के मुख्य सचिव और अन्य वरिष्ठ अफसर मदद के लिए दिल्ली बराबर फोन करते रहे।
दो घंटे बाद पहुंचे कमांडो:
फरियाद के करीब दो घंटे बाद मौके पर पहुंचे नौसेना की कमांडो टीम ने होटलों के अंदर जाने से यह कहकर इनकार कर दिया कि वे ऐसी कार्रवाइयों के लिए प्रशिक्षित ही नहीं हैं। वे बाहर से ही गोलियां चलाते रहे, अंदर आतंकी घूम-घूमकर बंधकों की हत्याए करते रहे।
दिल्ली में भी था बुरा हाल
दिल्ली में भी एनएसजी के कमांडो की टीम घंटों एयरपोर्ट पर इंतजार करती रही। जरूरी रूसी आईएल-76 विमान न तो पालम एयरफोर्स स्टेशन पर था न ही ंिहंडन पर। तब इसे चंडीगढ़ से मंगवाया गया। एनएसजी के मुख्यालय मानेसर (हरियाणा) से भी खस्ताहाल बसों से कमांडो को रवाना किया गया। टीम देर रात दो बजे मुंबई पहुंची क्योंकि विमान सुस्त चाल था और तीन घंटे लग गए।
बसों से रवाना हुई कमांडो टीम
मुंबई हवाई अड्डे से टीम को बिजी सड़कों से बिना पायलट कारों के आम बसों से मौके के लिए रवाना कर दिया गया। जब तक उन्होंने होटलों के बाहर पोजिशन ली, सुबह हो आई और आतंकी काफी खून बहा चुके थे। एक सरकारी अफसर का कहना है कि कमांडो कार्रवाई में करीब छह घंटे की देरी हुई और इससे मौतों की तादाद बढ़ी।
आपदा प्रबंधन का पता नहीं था
राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अफसर का कहना है कि कोई ‘सिंगल प्वाइंट कमांड’ न होने से समय से मदद नहीं मिल सकी। कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर की अगुवाई वाली आपदा प्रबंधन समिति की बैठक भी आधी रात के बाद ही हो सकी। क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन रात सवा 11 बजे तक एक डिनर पार्टी में थे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब उन्हें और बाकी सदस्यों को तलब किया तब वे रेस कोर्स रोड पहुंचे।
इस अफसर का कहना है कि समिति के सदस्य घरों पर टीवी देखकर और मोबाइल पर बात करके घटनाक्रम पर नजर रख रहे थे।

Monday, October 27, 2008

राहुल का हत्यारा राज ठाकरे



मुम्बई में राहुल राज के एंकाउंटर पर मैं भी कुछ लिखना चाहता था लेकिन पता नहीं क्यों लिख ही नहीं पा रहा हूं..इसी लिये अपने मित्र अमित कुमार का लिखा हुला लिंक दे रहा हूं..कुछ लिखियेगा तो हमें भी बताइयेगा....लिंक है http://www.charpahar.blogspot.com/ पढियेगा ज़रूर

Wednesday, September 3, 2008

दूसरी लाईन का संकट


दिनेश काण्डपाल


मीडिया में दूसरी लाईन का संकट खड़ा हो गया है...खास तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया में साल भर मे एक दो नये न्यूज चैनल आ जाते हैं...लेकिन सुपरहिट कोई नही हो पा रहा है...2005 के शुरू से लेकर आज जून 2008 तक जितने भी नेशनल न्यूज चैनल आये हैं उनकी कोई खास दमदार उपस्थिति दर्ज नही हो पाई है...नये न्यूज चैनल का तामझाम भी कोई कम बड़ा नही है...लोग भी जाने पहचाने है...लेकिन फिर भी नये चैनल सुपरहिट नही हो पा रहे हैं...चैनल 7सेवन नये फ्लेवर के साथ आया, उसकी प्रोग्रामिंग भी बढ़िया थी, लेकिन उतना दम नही दिखा जितना जागरण अखबार का है.....तब से आज तक तीन चार और नेशनल न्यूज चैनल आ चुके हैं...सब कुछ होने के बावजूद भी चैनल हिट नही है...वहीं एन सी आर रेंज में कुछ चैनल कमाल जरूर दिखा गये...एस वन ने 2005 में ही 46 वे हफ्ते में कईं नेशनल चैनल्स को पीछे छोड़ा...दिल्ली आजतक और टोटल लगातार बड़े चैनल्स की टीआरपी में सेंध लगाते हैं...दरअसल मीडिया में दूसरी लाईन नही है...एक सुपरहिट टीम में जितने सदस्य होने चाहिये...उतने जुट नही रहे हैं...कार्यकुशल व्यक्तियों का बड़ा अभाव पैदा हो गया है... बड़े नामों का सहारा लेकर नये लोग तो जरूर जुट रहे हैं, लेकिन उस टीम में वो बात नही आ पा रही है जो tv news चैनल्स के लिये जरूरी है...ऐसे न्यूज चैनल जो नवीनतम तकनीक के साथ मैदान में आ रहे हैं, उनकी तकनीक भी धरी की धरी रह जा रही है...उस तकनीक को उतनी ही कुशलता से संचालित करने के लिये जो दिमाग चाहिये वह नही मिल पा रहा है...बड़े नाम लगता है आराम की मुद्रा में भी है... किसी जमाने में में सुपरहिट चैनल का हिस्सा रहे बड़े नाम नयी जगह पर आक्रामक मुद्रा अख्तियार नही कर पा रहे हैं...एक अजब सी आरामतलबी का उनका मूड कई बार पूरे न्यूज रूम को सुस्त कर देता है...एक स्टोरी फाईल करने के अंदाज बदलने के साथ साथ उनकी कापी, विजुअल्स, पैकेजिंग और प्रस्तुतिकरण ये पूरा एक ऐसा विधान है जिसमें नयेपन की जरूरत हर रोज है...और ये नयापन कार्यकुशल व्यक्ति ही दे सकता है...कार्यकुशल व्यक्तियों का अभाव है...नई पीढ़ी जो टेलीविजन देखते देखते पली बढ़ी है उसके पास ऊर्जा है, नये विचार भी है, लेकिन वो परवान नही चढ़ पा रहे है...जबकि नौजवान बाकी सारी इंडस्ट्रीज में जलवा बिखेर रहे हैं...पिछले दिनों दिलीप मंडलजी ने अपने एक लेख में लिखा था कि इलेक्ट्रिक मीडिया ने दस साल में कुछ हासिल नही किया, जबकि अखबार, सिनेमा और इंटरनेट ने नये साहसिक विचारों के साथ धूम मचा दी है...यहां भी नौजवानों ने ही प्रयोग किये हैं..नई पीढ़ी केवल tv news में ही दूसरी लाईन नही बना पा रही है...या इसमे नई और पुरानी उम्र के लोगों का आहम तो आड़े नही आ रहा ? आक्रामक तेवर दिखाकर कुंवारे धोनी ने विश्वकप जीत लिया, लेकिन अब सारे लोग कूल कप्तान कहते हैं...ये उदाहरण भर है...नई पीढ़ी को इलेक्ट्रानिक मीडिया में खुलकर खेलने दे तो शायद दूसरी लाईन का संकट खत्म हो जाये...

Wednesday, August 13, 2008

हम कब से दुश्मन हो गये...


कश्मीर के दस ज़िले सुलग गये, एक बार तो ऐसा लगा कि पिछले पन्द्रह साल की मेहनत बेकार हो चुकी है। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन दी और फिर वापस ली, इस पूरी कार्यवाही में उतना फायदा नहीं हुआ जितना नुकसान हो गया। नीयत किसकी खराब है ये सवाल पीछे छूट चुका है। चिंता इस बात की बढ़ गयी है कि डेढ़ दशक की मेहनत पर पानी न फिर जाय। मारे तो सब जगह बेकसूर ही जायेंगें, लेकिन उनकी चिताओं की आग उन नेताओं की रोटियां ज़रूर सेंक देंगीं जिन्हैं कश्मीर का आवाम तकरीबन भूलने को है। अमन की सारी कोशिशें चिनाब के पानी में बरसाती पानी की तरह बह जायेंगी, और पीछे छूट जायेगा, देवदार के दरख्त का वों ठूंठ जिस पर पत्तियां उगने से इन्कार कर सकती हैं। बदजुबान और गंदी नीयतें धरती के स्वर्ग को बरबाद कर रही हैं, दिल्ली की चक्कियों में आटा पीस कर खाने वाले, मुज्जफराबाद चलों के नारे लगा रहे हैं। सरकार की बेबसी पर आप सिर्फ बेबस बन सकते हैं, गुस्सा भी कर सकते हैं उस नामर्दी पर जो इस देश की राजनीति में पल रही है। वो जैसा चाहे वैसा कर रहे हैं, हम जैसा चाहे वैसा कर रहे हैं, इस आग के रंग बदल दिये गये हैं, मौकापरस्त जश्न मना रहे हैं लेकिन स्तब्ध है वो आवाम जो इसे अपना देश मान रही है। एक ऐसा प्रस्ताव अभी तक नहीं आया है जिस में कोई जान हो, कोई सरकारी नुमाइंदा ये बताने की हिम्मत नहीं कर रहा कि वो क्या करने जा रहे हैं। अलगाववादियों की राजनीति ठंडी पड़ रही थी, बैठे बिठाये एक अदूरदर्शी फैसले ने आग बरसा दी। डरने वाले को राजा बने रहने का कोई हक नहीं, जो निर्भय नहीं उसे सिंहासन त्याग देना चाहिये, लोभ और मोह के ये पुतले केवल मौके बर्बाद कर रहे हैं और कुछ नहीं। इन लोगों की कारस्तानी ने दुश्मनी और बढ़ा दी हैं। आज के हालात देखिये और सोचिये जम्मू कब से कश्मीर का दुश्मन हो गया ? ये बात वो लोग कह सकते हैं जिनको इस मौके की तलाश थी लेकिन उनका क्या जिनकी सब्ज़ियों के ट्रक हाइवे पर खड़े हैं। सच है मरता इमानदार ही है। वो चंद लोग जो विषम से विषम परिस्थितियों में पुल बने रहे आज उनके पांव जकड़ दिये गये हैं..अफसोस हमें दुश्मन ठहरा दिया

Monday, August 11, 2008

तुम पर नाज़ है अभिनव


अभिनव बिन्द्रा पर हमें नाज़ है, ये क्षण हैं जब ओलम्पिक खेलों की मायूसी को तोड़ कर हम खुशी से उछलने के पलों को जी रहे हैं। अभिनव की कठिन मेहनत और एकाग्रता ने बीजिंग ओलम्पिक में तिरंगा लहरा कर कितना बड़ा इतिहास रच दिया है ये आने वाला वक्त बतायेगा। अभिनव की क़ामयाबी ने उस अंधेरे तिलिस्म को तोड़ा है जिसमके शिकंजे में भारत के खेल फंसे थे। ओलम्पिक का गोल्ड मेडल। ये पदक दिलों में अभिमान भर रहा है, भुजायें तन गयी हैं, सीने की चौड़ायी एका एक बढ़ गयी है। ये संकेत हैं प्रगति के। अभिनव तुमने एक बड़ा काम किया है। ये देश तुम्है याद रखे या न रखे, आज तुमने उस ऊंचाई को छू लिया है जहां से तुमको भूलने वाले खुद का आस्तिव भी भूल जायेंगें। तुम हमारी क़ामयाबी हो। तुम्हैं तहे दिल से शुक्रिया। बधाई हो

दिनेश काण्डपाल

Saturday, August 9, 2008

कॉंवड़ियो..रास्ता छोड़ो....कॉंवड़ियो..रास्ता छोड़ो


ये दर्द कभी भी दिल में उठ सकता है.. ये नारा कभी भी आपके मुंह से गाली की तरह निकल सकता है जब रात के दो बजे बस के अन्दर आपके माथे का पसीना रुकने का नाम न ले रहा हो..घर पंहुचने की बेताबी आपके सब्र का बार बार इम्तहान ले रही हो.. आपको अपनी ही छाती से पसीने की बदबू आने लगे..सड़क पर एक-दो-तीन से लेकर दस किलोमीटर तक का जाम आपकी सांसों में यू पी की सड़कों की धूल भर दे और हद तो तब हो जायेगी जब आपकी बीबी आपको गुस्से से देख कर कहेगी ..मैने पहले ही कहा था मुझे नहीं जाना लेकिन तुमने ज़िद की अब भुगतो..बेटा कई बार ये पूछेगा .. पापा..घर कब आयेगा..अगर बेटी हुयी तो खुद ही समझ जायेगी इस जाम में पापा क्या करेंगें। मेरा भी यही हाल हुआ, लेकिन ये जाम क्यों लगा है अगर ये सुन लिया तो हालत पतली हो जायेगी..ट्रक पर चार बड़े स्पीकर कान फाड़ू संगीत के साथ भोले की कैसट बजा रहे हैं और पांच साल से लेकर पचपन साल के शिव भक्त वही डांस कर रहे हैं जो दारू पीकर शादियों में करते हैं, उन्हें लग रहा है कि शिव का अंश बन कर तांडव के लिये उन्हीं को चुना गया है..ये हाल है साहब आजकल उन रास्तों का जहां से कांवड़िये गुज़रते हैं..इनके शरीर पर सुशोभित आभूषणों का वर्णन करू तो कागज कम पड़ जाय.. हाथ में बेस बॉल का बैट..ये ज़्यादातर अमेरिका और योरोप में खेला जाता है..लेकिन इन दिनों हिन्दुस्तानी शिव भक्त इन्हैं त्रिशूल की जगह प्रयोग करते हैं..रीबॉक से लेकर नाइकी का कोई भी बरमूडा चाल को और मोहक बना देता है..कमर में चमड़े का वो कमर बंद जिसके अन्दर संसार की वो वस्तुयें मिल जायेंगीं तो आपको तीन लोक के दर्शन करा सकें. थोड़ा ऊपर बढ़िये तो मालायें सुशोभित हैं..हाथ में रंग बिरंगी झालरों से सजी कांवड़.. कंठ से कर्कश ध्वनि के साथ शिव का जयघोष..आह ये भक्ति और मेरा पसीना..इतना लम्बा जाम ..और बम भोले के ये नारे..क्या करूं..मेरा तो मन करने लगा कि गाली दूं..स्ससससससााााााा को लेकिन शिव के कुपित होने का भय ये भी नहीं करवा पाया.. इन सड़कों पर नौजवानों की ये भक्ति को इन्द्र की कोई मेनका अगर भंग कर दे तो मैं उनका बड़ा आभारी रहूंगा..पांच सा सात घंटे जाम में फंसने की मेरी हिम्मत नहीं है..किसी से कुछ कह भी नहीं सकता पता नहीं कब अमेरिकी बेस बॉल का बैट शिव का त्रिशूल बन जाय और मेरे सर से ठीक उसी तरह लहू की धारा बह निकले जिस तरह से शिव के सर से गंगा बहती है..इस परिस्थिति में मैने अपनी बीबी को देखा बच्चे को अखबार का पंखा किया और गांधी जी का नाम लेकर केवल आग्रह किया..कॉंवड़ियो..रास्ता छोड़ो
दिनेश काण्डपाल

Sunday, August 3, 2008

पप्पू कैसे नाचे......


ये नया फिल्मी गाना ठीक उसी तरह से कई लोगों के पेट में दर्द कर रहा है जैसे कि फ्रेंडशिप डे..फ्रेंडशिप डे की घूम तो जम कर मच रही है लेकिन कोई इस बात को मानने के लिये तैयार नहीं कि इस दिन को हम वैसे ही अपना चुके हैं जैसे बसन्त पंचमी या मकर संक्राति ..इस दिन का हाल भी पप्पू जैसा ही हो गया है..इस गीत को चाहने वाले तो कई हैं लेकिन अपनाने वाला कोई नहीं.अब भला पप्पू कैसे नाचेगा..ग्वालियर में फ्रेडसिप डे से ठीक एक दिन पहले पुलिस वालों ने प्रेमी जोड़ों को पार्क से खदेड़ दिया..इन चाहत और प्यार की मूर्तियों की रास लीला पुलिस को नहीं भायी....प्यार कभी रुसवा नहीं होता..ठीक वैसे ही जैसे आप अपने कदमों को थिरकने से नहीं रोक सकते जब ये गाना बज रहा हो.....फ्रेडशिप डे का मतलब सबने अपने अपने हिसाब से निकाल लिया..किसी को प्यार नज़र आया तो किसी को तकरार...देश के हर कोने से दो तरह की खबर..एक तरफ डटे हैं ये जिन्हें ये ज़िद है कि फ्रेंडशिप डे मना कर रहेंगें और दूसरी तरफ हैं वो जो सोचते हैं ये फ्रेडशिव व्रेडशिप डे ठीक नहीं है.. आजकल अगर डिस्को जाने का मौका मिले तो आपको रिक्वेस्ट नहीं करनी पड़ेगी पप्पू का नाच खुद व खुद चल जायेगा लेकिन घर में ये गाना गुगुनाना हो तो हुजूर इजाज़त नहीं है..अब फ्रेशडिप डे मान लिया तो मलाल मत पालिये नहीं मना पाये तो सोच लीजिये पप्पू भी नाचेगा


दिनेश काण्डपाल

Sunday, July 27, 2008

पुरानी यादे ताज़ा करो




मछली जल की रानी है,
जीवन उसका पानी है।
हाथ लगाओ डर जायेगी
बाहर निकालो मर जायेगी।

पोशम्पा भाई पोशम्पा,
सौ रुपये की घडी चुराई।
अब तो जेल मे जाना पडेगा,
जेल की रोटी खानी पडेगी,
जेल का पानी पीना पडेगा।
थै थैयाप्पा थुश
मदारी बाबा खुश।

झूठ बोलना पाप है,
नदी किनारे सांप है।
काली माई आयेगी,
तुमको उठा ले जायेगी।

आज सोमवार है,
चूहे को बुखार है।
चूहा गया डाक्टर के पास,
डाक्टर ने लगायी सुई,
चूहा बोला उईईईईई।

आलू-कचालू बेटा कहा गये थे,
बन्दर की झोपडी मे सो रहे थे।
बन्दर ने लात मारी रो रहे थे,
मम्मी ने पैसे दिये हंस रहे थे।

तितली उडी, बस मे चढी।
सीट ना मिली,तो रोने लगी।।
driver बोला आजा मेरे पास,
तितली बोली " हट बदमाश "।

चन्दा मामा दूर के,
पूए पकाये भूर के।
आप खाएं थाली मे,
मुन्ने को दे प्याली मे।


.... इन यादों के लिये शिवानी ने भी जल्द ही कुछ लिख कर भेज दिया...
दिनेश बचपन की याद दिला दी तुमने...कुछ कमी मैं पूरी करने की कोशिश करती हूं...



अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो
अस्सी नब्बे पूरे सौ
सौ में लगा धागा चोर निकल के भागा
राजा की बेटी ऐसी थी फूलों की माला पोती थी...


दिनेश ये यहीं खतम होता है या इसके आगे भी है...ये याद करने के लिए मुझे बचपन में दुबारा लौटना होगा...

मुम्बई से मेरे दोस्त ने ये कवितायें भेजी हैं...

लल्ला लल्ला लोरी,
दूध की कटोरी,
दूध में बताशा,
गुड़िया करे तमाशा.

दो चुटियों वाली,
जीजा जी की साली,
जीजा गये अंदर,
साली को ले गया बंदर,

...और इंतज़ार है

नीतेश ने पहले टिप्पणी की थी तो हौसला बढ़ाया था .. अब दो दिन बाद इस सीरीज़ में इज़ाफा किया है...
मामा गए दिल्ली,
दिल्ली से लाये बिल्ली,
बिल्ली ने मारा पंजा,
मामा हो गए गंजा!!

.....और इंतज़ार है...
वॉयस आफ इंडिया में मेरे सहयोगी प्रोड्यूसर अनिल ने ये लिख कर भेजा है..जस का तस प्रकाशित कर रहा हूं..

दिनेश जी, आपके ब्लॉग पर आकर बचपन की वो यादें ताजा हो गईं जिन पर भागदौड़ भरी इस जिन्दगी के साथ गर्द जम गई थी। एक बार फिर मन में चंचलता अंगड़ाई लेने लगी। जी करने लगा कि बचपन का वो दौर एक बार फिर लौट आए। काश ऐसा हो पाता। मुझे भी एक कविता की चार लाइनें यद हैं...पेश कर रहा हूं...

(1)
मामा मामा भूख लगी
खा लो बेटा मूंगफली
मूंगफली में दाना नहीं
हम तुम्हारे मामा नहीं

(2)
लकड़ी की काठी
काठी का घोड़ा
घोड़े की दुम पर
जो मारा हथौड़ा
दौड़ा-दौडा-दौड़ा
घोड़ा दुम दबाकर दौड़ा। .....


और इंतज़ार है

Thursday, July 24, 2008

राम का शॉट ओ के है




मेरे अन्तर्यामी राम अब टीवी पर हर रोज़ दिख जाते हैं। राम सेतु की खबर में जैसे ही कोई नयी चीज़ जुड़ती है अरुण गोविल( रामायण में राम का किरदार निभाने वाले कलाकार) भावमय मुस्कान के साथ प्रकट हो जाते हैं। रिपोर्ट में केन्द्र सरकार पर गुस्सा बरपाया जा रहा हो या निंदा का कोई और रुप प्रकट किया जा रहा हो मेरे राम मुस्कुराते हुये ही नज़र आते हैं, हर दुख और दर्द से ऊपर मेरे राम का शॉट हमेशा ओ के रहता है...एनडीटीवी की रामायण के राम भी अच्छा अभिनय कर रहे हैं लेकिन राम की पोस्ट पर अभी अरुण गोविल ही काबिज़ हैं। हालांकि अभिषेक बच्चन अगर राम के रोल में आये तो पता नही टक्कर मिलेगी या नहीं...लेकिन फिलहाल आप जब भी मर्यादा पुरुषोत्तम का ध्यान करें अरुण गोविल को ज़रूर भज ले..राम सेतु की खबर पर विजुअल चलाने के लिये अगर आपको सोचना पड़ रहा है तो फिर आप अपने विवेक पर पुनर्विचार कर ले..क्योंकि समन्दर का विजुअल कॉमन होता है..मामला सरकार से जुड़ा है और सरकार के किसी भी आदमी की शक्ल फिलहाल टी आर पी नहीं है..इस खबर पर टीआरपी चाहिये तो राम राम भजिये ...रामानंद सागर के राम हाज़िर..सबसे आसान उप्लब्धि राम की ही है..ये राम संसद में मिल जाते हैं..टीवी पर तो हैं ही.. लेकिन इन्हें मुस्कुराते हुये ही देखियेगा और दिखाइयेगा..राम का स्वरूप क्रोध में जमता नहीं..बस मुस्कुराते हुये दिखाइये..बस फिर क्या...राम का शॉट ओ के है...

दिनेश काण्डपाल

Thursday, July 10, 2008

परिव्राजक ने लिखा था...


बी ए की पढाई के पहले साल में कविता लिखने का शौक चर्राया, उन्हीं दिनों गर्मी. में जब घर (चौखुटिया, रानीखेत ) गया तो एक बाबा जी से मुलाक़ात हुयी। उन्हें भी कविताओं का शौक था, अपना नाम परिव्राजक बताते थे..पहाड़ के पुरुषों में शराब की लत और पानी की कमी पर उन्होंने मुझे कुछ कवितायें दी थी ..कहा था कभी इन्हें छपवा देना..उनकी कुछ लाइनें मुझे याद रहीं..कब छपेंगीं पता नहीं, लेकिन आप यहां पढ़ लीजिये... ...... ..... .....

घिर गया है घाटियों में शोर का अन्धा धुआं
आदमी की शक्ल में हर ओर है अन्धा कुआँ
औरतों के आंसुओं की क़ीमतों पर जाम हैं
द्रोपदी फिर दांव पर है और जारी हैं जुआँ.....

चार लाइनें और....

लो कट गया फिर बांज का पौंधा
एक मटका गिर गया झरने तले औंधां
लोग प्यासे हैं उन्हैं मालूम है फिर भी
वृक्ष झाड़ी पत्थरों पर वार ही कौंधा....
....

परिव्राजक घूमते रहते थे एक जगह से दूसरी जगह कई सालों से मुलाकात नहीं हुयी है..कभी कभी उनकी याद आती है..और भी कवितायें हैं ..ढूढूंगा फिर आप तक पंहुचाऊंगा...दिनेश काण्डपाल

Sunday, July 6, 2008

कितना दर्द है बाबू



आपके सर में दर्द कब कब होता है,जब आप किसी से मिलते हैं तब दर्द होता है या जब किसी के बारे में सोचते हैं तब सर पकता है। अकेले बैठे हों तब दर्द होता है या आस पास कोई बैठा हो तब दर्द होता है, शान्त माहौल में दर्द होता है या
शोर शराबे में दर्द होता है इनमें से अगर कोई और कारण है तो दर्द की पृकृति भी निराली होगी, इनके अलावा एक सरदर्द की वजह और लक्षण मेरे पास भी हैं। ये एक नायाब किस्म का सर दर्द है जो इलेक्ट्रनिक मीडिया के तकरीबन हर कर्मचारी
को होता है। इस दर्द की उत्पत्ति का केन्द्र है चैनल के खामखा का केबिन। ज़ाहिर है यही केबिन पूरे चैनल का रिमोट कंट्रोल लेकर चलता है,ये दर्द पहले इस बड़े अफसर के खोपड़े में होता है ये उस की खुड़क भी हो सकती है जो आपको दर्द के रूप में नज़र
आ रही है, कई सठिया खामखा(वो जो साठ साल की उम्र के आस पास आकर अफसर बने हैं)ऐसी प्लानिंग करते हैं जो दर्द को माइग्रेन में बदल सकती है। ये उस क़िस्म के अफसर है जो टेलीविज़न चैनल चलाने निकले हैं लेकिन टेलीविज़न में बस विज़न ही किया है.टीवी देखने के अलावे इन अफसरों ने आज तक कुछ नहीं किया। खबर का मर्म इनके दिलों
में हुंकारें भरता है आक्रामक होने का नाटक भी इन्हैं जलवा फरोश बनाता है लेकिन इनकी लिखी स्क्रिप्ट पर जब पैकेज कटना होता है तो वाडियों एडिटर से लेकर चैनल एडीटर तक पांच बार मूतने जाते हैं। दर्द यहीं पैदा होता है। ये दर्द पैदा करने का आदेश भी होता है। खामखा की गर्वीली मुस्कान को साइकिल के टायर की तरह पंचर करने का सपना लिये ये प्रो़ड्यूसर
एक अदद डिसप्रिन के लिये तरस जाता है। प्रोड्यूसर को लगता है कि किसने इसको खामखा बना दिया, कुछ जानता भी है साला टीवी के बारे में। स्टोरी पूरी कट गयी तो अध्धा नहीं तो साला बीयर और व्हिस्की का कॉकटेल करना पड़ेगा। सर दर्द कम करने का ये ख्याली पुलाव भर है दरअसल गैस्टिक के मरीज़ से पूछिये थोड़ी सी गैस निकल जाने पर बदबू ही सही पर उसे
अच्छी लगात है पेट की राहत बड़ी अजीब है। न्यूज़ रूम में पसरा सन्नाटा भी सर दर्द बढ़ाता है कई कामचोर और बकलोलों से बना न्यूजरूम तो देखने लायक होता है। यहां आपको आदर्श टीवी पत्रकारिता के मापदंड़ों पर मां बहन करते कई बड़े नाम मिल जायेगें लेकिन एक ब्रेकिंग पर आगे का पैकेज क्या होगा ये सोचने में इनकी दो डिब्बियां खत्म हो जायेंगी। इनके पास
स्क्रिपट के लेकर कई अच्छे शब्द हैं लेकिन खायें अपनी मां की कसम ये बकलोल की एक बाक्य को ज़रा सुधार दें। दरअसल जिस खामखा का ज़िक्र मैने ऊपर किया वो इन बकलोलों का बाप है,वो इसी सेना के बूते बाप बना है। सर दर्द पैदा करने के अभूतपूर्व आइडियों से ये हमेशा लैस रहते हैं जो भी काम करते दिखा वो इनके सर में दर्द पैदा करने लगता है इसलिये
ये बकलोल इस बात की नौबत ही नहीं आने देते कि कोई काम कर सके। बाप से लेकर ये उनकी औलादें हर तरफ दर्द बांटती हैं। दर्द देख कर भी होता है सुनकर भी अकेले में भी और भीड़ में भी अब दर्द तो बड़ा होगा ही आखिर खामखा से चलकर आया और औलादों ने और बड़ा कर दिया..घबराने की ज़रूरत नहीं ज़्यादा दिन नहीं चलेगा, भरोसा रखिये सब ठीक होगा

दिनेश काण्डपाल

Saturday, May 24, 2008

न्यूज़रूम से घर तक


दिनेश काण्डपाल
उसने आरुषि को कैसे मारा होगा..कोई ऐसा कर सकता है क्या...ऐसा कैसे हो सकता है यार.. लगभग दो घंटे बाद नींद से जागकर फिर मुझे जगाया लगभग दो बज रहे थे.मुझसे बोली मुझे डर लग रहा है..सरिता आज बच्चे तो अपने आंचल से चिपका कर सो रही थी..मैं उसकी करवट महसूस कर रहा था...दिन भर आरुषि मर्डर केस की गुत्थियों में उलझ कर सुझाने की मीडिया ट्रायल में मैं भी शरीक था..हर पल आती खबरों के साथ पूरा न्यूज़ रूम तनाव में था..बॉस का प्रेशर था कि एंगल निकालो..आरुषि के मर्डर पर एंगल निकालना परमवीर चक्र लेने से कम बड़ा काम नहीं था...रात के ग्यारह बजे इतना थक चुका था कि . . बच्चे का रोना मुझे खल रहा था और मैं कोई वाल जवाब करने के मूड में नहीं था..लेकिन सरिता दिन भर से मेरा इंतज़ार कर रही थी.उसे लगता था..उसके मन में उमड़ रहे सवालों के सारे जवाब मेरे पास हैं...बताओ ना .. तुमने तो सारे विजुअल देखे हैं..एक्पर्ट क्या कह रहे थे..क्राइम वालों का क्या कहना है... आरुषि मर्डर केस मेरे बैडरुम में बहने वाले हवा में घुल चुका था..सात दिन से टीवी पर आरुषि की गुत्थियां सुलझाने में लगे न्यूज़ चैनल्स ने दिलचस्पी तो ज़रूर पैदा की लेकिन ..ये केस दिलचस्पी की हदों को तोड़ कर दिल दिमाग सब जगह घुस चुका था..चौंकने की कइ वजहें थीं..एक घर में कितने नाजायज़ समबन्ध हो सकते हैं..डॉक्टर की बीबी क्या कुछ नहीं कहती होगी..आरुषि तो छोटी बच्ची थी उसके बारे में ऐसी बात क्यों हो रही है..बताओ ना..ऐसा हो सकता है क्या..मैं आखें बन्द कर रही हूं तो आरुषि का ही चेहरा घूम रहा है ..क्या हो गया यार इस दुनिया को..अच्छा हेमराज की उम्र तो चालीस से ज़्यादा थी ना..उसने मारा होगा क्या..सरिता के अन्दर का डर अब मेरे अन्दर पंहुच चुका था.. मैं घबरा रहा था कि इसे क्या हो गया..आरुषि मर्डर केस में मेरी दिलचस्पी थी लेकिन वो एंगल निकालने से ज़्यादा नहीं थी..उस रात सरिता की झंुझलाहट और बैचेनी ने मेरी परेशानी को बढ़ा दिया .. मैं सोचने लगा कि क्या कह कर इस विषय को खत्म करूं..थोड़ी बहुत कोशिश मैने की..मैने कहा कि तुम ये सब क्या सोच रही हो..छोड़ो ना..सो जाओं..अबे हमें क्या करना है यार..ये लोग ऐसे ही हैं..तुम सो जाओ..सरिता बेहद असंतुष्ट थी मेरे जवाब से .. दरअसल वो खुद अपने सवालों में ही इतनी उलझ चुकी थी कि सारे जवाब जानने के बाद भी वो मेरे मुंह से कुछ सुनना चाहती थी इस बारे में...मैं कुछ नहीं कहना चाहता था..न्यूज़ रुम की खबरों को में घर लेकर नहीं आता..लेकिन मुझे समझ में आया कि न्यूज़रुम की खबरें घर ही तो आती हैं....

Friday, February 8, 2008

सही कहा खन्ना साहब



िदल्ली के उपराज्यपाल ट्रेिफक पुिलस के एक समारोह में थे। उन्होंने कहा िनयम क़ायदे तोड़ना गलत बात है और हम उत्तर भारत के लोग िनयम तोड़ने में गर्व महसूस करते हैं। खन्ना साहब ने जो कुछ भी कहा अपने अनुभव से कहा होगा ऐसा मुझे लगता है। जो लोग दक्षिण भारत में कुछ समय तक रह कर आये हैं वो शायद खन्ना साहब की बात से ज़रूर इत्तेफाक़ रखते होंगें। ढ़ाई साल तक हैदराबाद में रहने का मेरा अनुभव तो यही कहता है िक खन्ना साहब ने ठीक कहा। मुम्बई में अंधेरी स्टेशन पर उतरने पर अगर आपको सीढ़ियों पर लम्बी लाईन िदखे तो चौंकिये मत। मुम्बई में लोग बसों में चढ़ने के लिये लाईन लगाते हैं। उत्तर भारत के किसी शहरो में मैंने नहीं देखा कि बस में लाईन लगा कर चढ़ा जाता हो। ट्रेिफक नियमों कि धज्जियां उड़ाने का आध्यात्मिक आनंद तो अद्भुत है। रेड लाईट जम्प करके क्या मज़ा आता है ये तो ज़बान से समझाया ही नहीं जा सकता बस महसूस किया जा सकता है। ये सब हैदराबाद और मुम्बई में भी होता है लेकिन ऐसा नहीं जैसा दिल्ली में होता है। दिल्ली में अाटो की सवारी अगर आप करते हैं तो समझ सकते है कि दर्द क्या होता है। मुम्बई में आटो चालकों की शालीनता और इमानदारी का मैं कायल हूं। इक्कीस रुपये पचास पैसे के बिल पर मैंने जब पच्चीस रुपये दिये तो आटो चालक ने मुझे पूरे तीन रुपये पाचस पैसे लौटाये। दिल्ली के परिवहन मंत्री ज़रा बतायें कि आटो चालक कितने काबू में हैं। दिल्ली में आटो वाले ने अगर देख लिया कि सवारी मुसीबत में है तो फिर सवारी की जेब पर उस्तरा चलता तय है। एक बार फिर से बस की बात पर आता हूं। पिछले दिनों मुझे दिल्ली में लो फ्लोर बसों की सवारी का मौका मिला। वजीरपुर से ये बस बनकर चलती है। वजीरपुर पर जैसे ही शानदार चमचमाती बस आयी स्टाप पर सवारियों की धक्का मु्ककी ने उसकी शान को बट्टा लगा दिया। बड़ा दिल दुखा मेरा। बस कंडक्टर का व्यवहार हर रोज़ बेइज्जत करता है। इतनी बड़ी पुलिस के बाद भी ब्लू लाईन के ड्राइवर का अदम्य साहस ही है कि वो जहां मर्जी बस को रोक सकता है। और ये काम वो ड्राइवर हर रोज़ करता है। कई बाते हैं जो उपराज्यपाल ने कही थी इस बात के अलावा भी उनको भी सुन लेते तो अच्छा था।
राज ठाकरे ने जो आग लगाई उसमे तेजिन्दर खन्ना के बयान ने घी कैसे डाल दिया, खैर, ठीक नहीं है दोनों के बयान को जोड़ना। एक विशु्द्ध राजनीति कर रहा है तो दूसरा थोड़ा दर्द बयान कर रहा है। हमको बुरा क्यू लगता है अपने बारे में बुरा सुनकर। किसी की क्या सुनना। ये तो हमारा दिल भी जानता है कि खन्ना साहब ने ठीक कहा या ग़लत।

दिनेश काण्डपाल

Thursday, February 7, 2008

छोटे क़द के राज


राज ठाकरे को मैं पसंद करता था। राज के बारे में ज़्यादा नहीं जानता था। इतना पता था िक वो अच्छे कार्टून बनाते हैं, जब राज ने िशव सेना छोड़ी उस वक्त मैं बाल ठाकरे के पुत्र प्रेम को दोषी मानता था लेिकन आज मुझे बाला साहेब ठाकरे का िनर्णय ठीक लग रहा है। महाराष्ट्र नव िनर्माण सेना के नामकरण के वक्त भी मैं चौंका था लेिकन नाम के पीछे राज मन में क्या उद्देश्य पालेंगें ये सोचा भी नहीं था। शकल देखने पर लगता था िक राज का व्यक्ितत्व िवराट है, उनमें बड़े नेता बनने की अपार संभावनाओं ने ही राज को मेरी पसंद बनाया था, लेिकन राज इतने असहाय हो जायेंगें ये स्वीकार करने मंे मुझे बड़ा वक्त लग गया। नौजवान अफसरों की कमी हमारे देश की सेना में भी है और राजनीित में भी। इस साल नेश्नल िडफ्ेंस अकादमी को तीन सौ से ज़्यादा कैडेट्स चािहये थे लेिकन िमले केवल एक सौ नब्बे। राजनीित में नौजवानो तो इतना टोटा हो गया है िक दूर तक रास्ता नहीं िदखता। ऐसे में राज ठाकरे से मैने बड़ी उम्मीद लगायी थी। सब टूट गयी। क्या राज केवल मराठी और उत्तर भारतीय के मुद्दे को लेकर ये सोच रहे हैं िक वो अपना बेड़ा पार लगा लेंगें। मुझे बड़ी दया आती है राज ठाकरे और उनके सलाहकारों पर। आज का नौजवान क्या सपने पाल रहा है और उसके नौजवान नेता क्या रास्ता िदखा रहे हैं। राज की पार्टी की ताज़ा धमकी सुनकर तो मैं ठहाके लगाये बगैर नहीं रह सका। अब राज ठाकरे ने धमकाया है िक वो उत्तर भारत से आने वाली ट्रेनों को महाराष्ट्र में घुसने नहीं देंगें। अपने को स्व्यंभू मरािठयों का नेता कहने वाले राज ठाकरे ये कैसे तय करेंगें िक आंध्रा एक्सप्रेस जो नई िदल्ली से हैदराबाद जाती है उसे वो ब्लारशाह पर रोकेंगें या ठाणे जायेंगें। खैर ये तो ज़्यादा टैक्िनकल बात हो गयी लेिकन राज की ये धमिकयां बड़ी परेशान करने वाली हैं। आज तो ये बात कानून व्यवस्था के िलये परेशान करने वाली हैं लेिकन कल राज के िलये ये बात बड़ी परेशानी बन सकती है कोई जा कर राज को समझाये। इस मुदेद के बाद राज का कद इतना छोटा हो जायेगा िक राज भी खुद को देख कर शर्मा जायेंगें।

िदनेश काण्डपाल