Monday, October 27, 2008

राहुल का हत्यारा राज ठाकरे



मुम्बई में राहुल राज के एंकाउंटर पर मैं भी कुछ लिखना चाहता था लेकिन पता नहीं क्यों लिख ही नहीं पा रहा हूं..इसी लिये अपने मित्र अमित कुमार का लिखा हुला लिंक दे रहा हूं..कुछ लिखियेगा तो हमें भी बताइयेगा....लिंक है http://www.charpahar.blogspot.com/ पढियेगा ज़रूर

Wednesday, September 3, 2008

दूसरी लाईन का संकट


दिनेश काण्डपाल


मीडिया में दूसरी लाईन का संकट खड़ा हो गया है...खास तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया में साल भर मे एक दो नये न्यूज चैनल आ जाते हैं...लेकिन सुपरहिट कोई नही हो पा रहा है...2005 के शुरू से लेकर आज जून 2008 तक जितने भी नेशनल न्यूज चैनल आये हैं उनकी कोई खास दमदार उपस्थिति दर्ज नही हो पाई है...नये न्यूज चैनल का तामझाम भी कोई कम बड़ा नही है...लोग भी जाने पहचाने है...लेकिन फिर भी नये चैनल सुपरहिट नही हो पा रहे हैं...चैनल 7सेवन नये फ्लेवर के साथ आया, उसकी प्रोग्रामिंग भी बढ़िया थी, लेकिन उतना दम नही दिखा जितना जागरण अखबार का है.....तब से आज तक तीन चार और नेशनल न्यूज चैनल आ चुके हैं...सब कुछ होने के बावजूद भी चैनल हिट नही है...वहीं एन सी आर रेंज में कुछ चैनल कमाल जरूर दिखा गये...एस वन ने 2005 में ही 46 वे हफ्ते में कईं नेशनल चैनल्स को पीछे छोड़ा...दिल्ली आजतक और टोटल लगातार बड़े चैनल्स की टीआरपी में सेंध लगाते हैं...दरअसल मीडिया में दूसरी लाईन नही है...एक सुपरहिट टीम में जितने सदस्य होने चाहिये...उतने जुट नही रहे हैं...कार्यकुशल व्यक्तियों का बड़ा अभाव पैदा हो गया है... बड़े नामों का सहारा लेकर नये लोग तो जरूर जुट रहे हैं, लेकिन उस टीम में वो बात नही आ पा रही है जो tv news चैनल्स के लिये जरूरी है...ऐसे न्यूज चैनल जो नवीनतम तकनीक के साथ मैदान में आ रहे हैं, उनकी तकनीक भी धरी की धरी रह जा रही है...उस तकनीक को उतनी ही कुशलता से संचालित करने के लिये जो दिमाग चाहिये वह नही मिल पा रहा है...बड़े नाम लगता है आराम की मुद्रा में भी है... किसी जमाने में में सुपरहिट चैनल का हिस्सा रहे बड़े नाम नयी जगह पर आक्रामक मुद्रा अख्तियार नही कर पा रहे हैं...एक अजब सी आरामतलबी का उनका मूड कई बार पूरे न्यूज रूम को सुस्त कर देता है...एक स्टोरी फाईल करने के अंदाज बदलने के साथ साथ उनकी कापी, विजुअल्स, पैकेजिंग और प्रस्तुतिकरण ये पूरा एक ऐसा विधान है जिसमें नयेपन की जरूरत हर रोज है...और ये नयापन कार्यकुशल व्यक्ति ही दे सकता है...कार्यकुशल व्यक्तियों का अभाव है...नई पीढ़ी जो टेलीविजन देखते देखते पली बढ़ी है उसके पास ऊर्जा है, नये विचार भी है, लेकिन वो परवान नही चढ़ पा रहे है...जबकि नौजवान बाकी सारी इंडस्ट्रीज में जलवा बिखेर रहे हैं...पिछले दिनों दिलीप मंडलजी ने अपने एक लेख में लिखा था कि इलेक्ट्रिक मीडिया ने दस साल में कुछ हासिल नही किया, जबकि अखबार, सिनेमा और इंटरनेट ने नये साहसिक विचारों के साथ धूम मचा दी है...यहां भी नौजवानों ने ही प्रयोग किये हैं..नई पीढ़ी केवल tv news में ही दूसरी लाईन नही बना पा रही है...या इसमे नई और पुरानी उम्र के लोगों का आहम तो आड़े नही आ रहा ? आक्रामक तेवर दिखाकर कुंवारे धोनी ने विश्वकप जीत लिया, लेकिन अब सारे लोग कूल कप्तान कहते हैं...ये उदाहरण भर है...नई पीढ़ी को इलेक्ट्रानिक मीडिया में खुलकर खेलने दे तो शायद दूसरी लाईन का संकट खत्म हो जाये...

Wednesday, August 13, 2008

हम कब से दुश्मन हो गये...


कश्मीर के दस ज़िले सुलग गये, एक बार तो ऐसा लगा कि पिछले पन्द्रह साल की मेहनत बेकार हो चुकी है। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन दी और फिर वापस ली, इस पूरी कार्यवाही में उतना फायदा नहीं हुआ जितना नुकसान हो गया। नीयत किसकी खराब है ये सवाल पीछे छूट चुका है। चिंता इस बात की बढ़ गयी है कि डेढ़ दशक की मेहनत पर पानी न फिर जाय। मारे तो सब जगह बेकसूर ही जायेंगें, लेकिन उनकी चिताओं की आग उन नेताओं की रोटियां ज़रूर सेंक देंगीं जिन्हैं कश्मीर का आवाम तकरीबन भूलने को है। अमन की सारी कोशिशें चिनाब के पानी में बरसाती पानी की तरह बह जायेंगी, और पीछे छूट जायेगा, देवदार के दरख्त का वों ठूंठ जिस पर पत्तियां उगने से इन्कार कर सकती हैं। बदजुबान और गंदी नीयतें धरती के स्वर्ग को बरबाद कर रही हैं, दिल्ली की चक्कियों में आटा पीस कर खाने वाले, मुज्जफराबाद चलों के नारे लगा रहे हैं। सरकार की बेबसी पर आप सिर्फ बेबस बन सकते हैं, गुस्सा भी कर सकते हैं उस नामर्दी पर जो इस देश की राजनीति में पल रही है। वो जैसा चाहे वैसा कर रहे हैं, हम जैसा चाहे वैसा कर रहे हैं, इस आग के रंग बदल दिये गये हैं, मौकापरस्त जश्न मना रहे हैं लेकिन स्तब्ध है वो आवाम जो इसे अपना देश मान रही है। एक ऐसा प्रस्ताव अभी तक नहीं आया है जिस में कोई जान हो, कोई सरकारी नुमाइंदा ये बताने की हिम्मत नहीं कर रहा कि वो क्या करने जा रहे हैं। अलगाववादियों की राजनीति ठंडी पड़ रही थी, बैठे बिठाये एक अदूरदर्शी फैसले ने आग बरसा दी। डरने वाले को राजा बने रहने का कोई हक नहीं, जो निर्भय नहीं उसे सिंहासन त्याग देना चाहिये, लोभ और मोह के ये पुतले केवल मौके बर्बाद कर रहे हैं और कुछ नहीं। इन लोगों की कारस्तानी ने दुश्मनी और बढ़ा दी हैं। आज के हालात देखिये और सोचिये जम्मू कब से कश्मीर का दुश्मन हो गया ? ये बात वो लोग कह सकते हैं जिनको इस मौके की तलाश थी लेकिन उनका क्या जिनकी सब्ज़ियों के ट्रक हाइवे पर खड़े हैं। सच है मरता इमानदार ही है। वो चंद लोग जो विषम से विषम परिस्थितियों में पुल बने रहे आज उनके पांव जकड़ दिये गये हैं..अफसोस हमें दुश्मन ठहरा दिया

Monday, August 11, 2008

तुम पर नाज़ है अभिनव


अभिनव बिन्द्रा पर हमें नाज़ है, ये क्षण हैं जब ओलम्पिक खेलों की मायूसी को तोड़ कर हम खुशी से उछलने के पलों को जी रहे हैं। अभिनव की कठिन मेहनत और एकाग्रता ने बीजिंग ओलम्पिक में तिरंगा लहरा कर कितना बड़ा इतिहास रच दिया है ये आने वाला वक्त बतायेगा। अभिनव की क़ामयाबी ने उस अंधेरे तिलिस्म को तोड़ा है जिसमके शिकंजे में भारत के खेल फंसे थे। ओलम्पिक का गोल्ड मेडल। ये पदक दिलों में अभिमान भर रहा है, भुजायें तन गयी हैं, सीने की चौड़ायी एका एक बढ़ गयी है। ये संकेत हैं प्रगति के। अभिनव तुमने एक बड़ा काम किया है। ये देश तुम्है याद रखे या न रखे, आज तुमने उस ऊंचाई को छू लिया है जहां से तुमको भूलने वाले खुद का आस्तिव भी भूल जायेंगें। तुम हमारी क़ामयाबी हो। तुम्हैं तहे दिल से शुक्रिया। बधाई हो

दिनेश काण्डपाल

Saturday, August 9, 2008

कॉंवड़ियो..रास्ता छोड़ो....कॉंवड़ियो..रास्ता छोड़ो


ये दर्द कभी भी दिल में उठ सकता है.. ये नारा कभी भी आपके मुंह से गाली की तरह निकल सकता है जब रात के दो बजे बस के अन्दर आपके माथे का पसीना रुकने का नाम न ले रहा हो..घर पंहुचने की बेताबी आपके सब्र का बार बार इम्तहान ले रही हो.. आपको अपनी ही छाती से पसीने की बदबू आने लगे..सड़क पर एक-दो-तीन से लेकर दस किलोमीटर तक का जाम आपकी सांसों में यू पी की सड़कों की धूल भर दे और हद तो तब हो जायेगी जब आपकी बीबी आपको गुस्से से देख कर कहेगी ..मैने पहले ही कहा था मुझे नहीं जाना लेकिन तुमने ज़िद की अब भुगतो..बेटा कई बार ये पूछेगा .. पापा..घर कब आयेगा..अगर बेटी हुयी तो खुद ही समझ जायेगी इस जाम में पापा क्या करेंगें। मेरा भी यही हाल हुआ, लेकिन ये जाम क्यों लगा है अगर ये सुन लिया तो हालत पतली हो जायेगी..ट्रक पर चार बड़े स्पीकर कान फाड़ू संगीत के साथ भोले की कैसट बजा रहे हैं और पांच साल से लेकर पचपन साल के शिव भक्त वही डांस कर रहे हैं जो दारू पीकर शादियों में करते हैं, उन्हें लग रहा है कि शिव का अंश बन कर तांडव के लिये उन्हीं को चुना गया है..ये हाल है साहब आजकल उन रास्तों का जहां से कांवड़िये गुज़रते हैं..इनके शरीर पर सुशोभित आभूषणों का वर्णन करू तो कागज कम पड़ जाय.. हाथ में बेस बॉल का बैट..ये ज़्यादातर अमेरिका और योरोप में खेला जाता है..लेकिन इन दिनों हिन्दुस्तानी शिव भक्त इन्हैं त्रिशूल की जगह प्रयोग करते हैं..रीबॉक से लेकर नाइकी का कोई भी बरमूडा चाल को और मोहक बना देता है..कमर में चमड़े का वो कमर बंद जिसके अन्दर संसार की वो वस्तुयें मिल जायेंगीं तो आपको तीन लोक के दर्शन करा सकें. थोड़ा ऊपर बढ़िये तो मालायें सुशोभित हैं..हाथ में रंग बिरंगी झालरों से सजी कांवड़.. कंठ से कर्कश ध्वनि के साथ शिव का जयघोष..आह ये भक्ति और मेरा पसीना..इतना लम्बा जाम ..और बम भोले के ये नारे..क्या करूं..मेरा तो मन करने लगा कि गाली दूं..स्ससससससााााााा को लेकिन शिव के कुपित होने का भय ये भी नहीं करवा पाया.. इन सड़कों पर नौजवानों की ये भक्ति को इन्द्र की कोई मेनका अगर भंग कर दे तो मैं उनका बड़ा आभारी रहूंगा..पांच सा सात घंटे जाम में फंसने की मेरी हिम्मत नहीं है..किसी से कुछ कह भी नहीं सकता पता नहीं कब अमेरिकी बेस बॉल का बैट शिव का त्रिशूल बन जाय और मेरे सर से ठीक उसी तरह लहू की धारा बह निकले जिस तरह से शिव के सर से गंगा बहती है..इस परिस्थिति में मैने अपनी बीबी को देखा बच्चे को अखबार का पंखा किया और गांधी जी का नाम लेकर केवल आग्रह किया..कॉंवड़ियो..रास्ता छोड़ो
दिनेश काण्डपाल

Sunday, August 3, 2008

पप्पू कैसे नाचे......


ये नया फिल्मी गाना ठीक उसी तरह से कई लोगों के पेट में दर्द कर रहा है जैसे कि फ्रेंडशिप डे..फ्रेंडशिप डे की घूम तो जम कर मच रही है लेकिन कोई इस बात को मानने के लिये तैयार नहीं कि इस दिन को हम वैसे ही अपना चुके हैं जैसे बसन्त पंचमी या मकर संक्राति ..इस दिन का हाल भी पप्पू जैसा ही हो गया है..इस गीत को चाहने वाले तो कई हैं लेकिन अपनाने वाला कोई नहीं.अब भला पप्पू कैसे नाचेगा..ग्वालियर में फ्रेडसिप डे से ठीक एक दिन पहले पुलिस वालों ने प्रेमी जोड़ों को पार्क से खदेड़ दिया..इन चाहत और प्यार की मूर्तियों की रास लीला पुलिस को नहीं भायी....प्यार कभी रुसवा नहीं होता..ठीक वैसे ही जैसे आप अपने कदमों को थिरकने से नहीं रोक सकते जब ये गाना बज रहा हो.....फ्रेडशिप डे का मतलब सबने अपने अपने हिसाब से निकाल लिया..किसी को प्यार नज़र आया तो किसी को तकरार...देश के हर कोने से दो तरह की खबर..एक तरफ डटे हैं ये जिन्हें ये ज़िद है कि फ्रेंडशिप डे मना कर रहेंगें और दूसरी तरफ हैं वो जो सोचते हैं ये फ्रेडशिव व्रेडशिप डे ठीक नहीं है.. आजकल अगर डिस्को जाने का मौका मिले तो आपको रिक्वेस्ट नहीं करनी पड़ेगी पप्पू का नाच खुद व खुद चल जायेगा लेकिन घर में ये गाना गुगुनाना हो तो हुजूर इजाज़त नहीं है..अब फ्रेशडिप डे मान लिया तो मलाल मत पालिये नहीं मना पाये तो सोच लीजिये पप्पू भी नाचेगा


दिनेश काण्डपाल

Sunday, July 27, 2008

पुरानी यादे ताज़ा करो




मछली जल की रानी है,
जीवन उसका पानी है।
हाथ लगाओ डर जायेगी
बाहर निकालो मर जायेगी।

पोशम्पा भाई पोशम्पा,
सौ रुपये की घडी चुराई।
अब तो जेल मे जाना पडेगा,
जेल की रोटी खानी पडेगी,
जेल का पानी पीना पडेगा।
थै थैयाप्पा थुश
मदारी बाबा खुश।

झूठ बोलना पाप है,
नदी किनारे सांप है।
काली माई आयेगी,
तुमको उठा ले जायेगी।

आज सोमवार है,
चूहे को बुखार है।
चूहा गया डाक्टर के पास,
डाक्टर ने लगायी सुई,
चूहा बोला उईईईईई।

आलू-कचालू बेटा कहा गये थे,
बन्दर की झोपडी मे सो रहे थे।
बन्दर ने लात मारी रो रहे थे,
मम्मी ने पैसे दिये हंस रहे थे।

तितली उडी, बस मे चढी।
सीट ना मिली,तो रोने लगी।।
driver बोला आजा मेरे पास,
तितली बोली " हट बदमाश "।

चन्दा मामा दूर के,
पूए पकाये भूर के।
आप खाएं थाली मे,
मुन्ने को दे प्याली मे।


.... इन यादों के लिये शिवानी ने भी जल्द ही कुछ लिख कर भेज दिया...
दिनेश बचपन की याद दिला दी तुमने...कुछ कमी मैं पूरी करने की कोशिश करती हूं...



अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो
अस्सी नब्बे पूरे सौ
सौ में लगा धागा चोर निकल के भागा
राजा की बेटी ऐसी थी फूलों की माला पोती थी...


दिनेश ये यहीं खतम होता है या इसके आगे भी है...ये याद करने के लिए मुझे बचपन में दुबारा लौटना होगा...

मुम्बई से मेरे दोस्त ने ये कवितायें भेजी हैं...

लल्ला लल्ला लोरी,
दूध की कटोरी,
दूध में बताशा,
गुड़िया करे तमाशा.

दो चुटियों वाली,
जीजा जी की साली,
जीजा गये अंदर,
साली को ले गया बंदर,

...और इंतज़ार है

नीतेश ने पहले टिप्पणी की थी तो हौसला बढ़ाया था .. अब दो दिन बाद इस सीरीज़ में इज़ाफा किया है...
मामा गए दिल्ली,
दिल्ली से लाये बिल्ली,
बिल्ली ने मारा पंजा,
मामा हो गए गंजा!!

.....और इंतज़ार है...
वॉयस आफ इंडिया में मेरे सहयोगी प्रोड्यूसर अनिल ने ये लिख कर भेजा है..जस का तस प्रकाशित कर रहा हूं..

दिनेश जी, आपके ब्लॉग पर आकर बचपन की वो यादें ताजा हो गईं जिन पर भागदौड़ भरी इस जिन्दगी के साथ गर्द जम गई थी। एक बार फिर मन में चंचलता अंगड़ाई लेने लगी। जी करने लगा कि बचपन का वो दौर एक बार फिर लौट आए। काश ऐसा हो पाता। मुझे भी एक कविता की चार लाइनें यद हैं...पेश कर रहा हूं...

(1)
मामा मामा भूख लगी
खा लो बेटा मूंगफली
मूंगफली में दाना नहीं
हम तुम्हारे मामा नहीं

(2)
लकड़ी की काठी
काठी का घोड़ा
घोड़े की दुम पर
जो मारा हथौड़ा
दौड़ा-दौडा-दौड़ा
घोड़ा दुम दबाकर दौड़ा। .....


और इंतज़ार है