Thursday, April 9, 2015

ये टीवी और ट्विटर की जंग है



विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह के Presstitutes वाले बयान पर मचे बवाल और टीवी चैनलों की बहस में ट्विटर कहीं आगे निकल गया। ट्वीट्स की संख्या के आधार पर जनरल के समर्थक टाइम्स नाउ और अर्णब गोस्वामी पर हर तरह की फब्तियां कसने की छूट लेने लगे। कई उत्साहि ट्वीटिये तो ये दावा करने लगे कि टाइम्स नाउ के एडिटर अरण्ब गोस्वामी ये जंग हार चुके हैं इसलिये उन्हें अब माफी मांग लेगी चाहिये।

दरअसल शुरुआत टाइम्स नाउ ने जनरल वी के सिंह के उस बयान से की जिसमें उन्होंने यमन के रेस्क्यू ऑपरेशन और पाकिस्तानी हाईकमीशन में अपने दौरे की तुलना की। कई जनरल समर्थक प्रेक्षक ये मानते हैं कि वीके सिंह इस बात से आहत थे कि भारत सरकार, नेवी और एयरफोर्स के शानदार  काम को मीडिया तवज्जो नहीं दे रही थी इसलिये ये एक व्यंगात्मक बयान था, लेकिन टाइम्स नाउ ने इस भावार्थ में जाने की कोई ज़रूरत न समझते हुए अपने संपादकीय विवेक का प्रयोग किया। नतीजा हम सबके सामने था। टाइम्स नाउ चैनल और उसके ट्विटर हैंडल से जनरल पर एक के बाद एक वार होने लगे। जनरल साहब पता नहीं कब के खार खाये हुए बैठे थे..सो उन्होंने देखा कि देश का माहौल उनके अनुकूल है, पीएम साहब विदेश जाने वाले हैं, उनके खिलाफ बोलने वाला भवनात्मक रूप से पिट जाएगा इसलिये उन्होंने ट्वीट दाग दिया।

जनरल साहब तो जनरल बने ही इसलिये कि सही मौके पर चोट कर सकें सो उन्होंने कर दी। अब इस बार चोट का निशाना सीधे अर्ण गोस्वामी थे। बाकयादा नाम लेकर ट्वीट किया। जो नहीं भी देखता उसे उकसा दिया। एकदम गाइडेड मिसाइल ट्वीट दागा जनरल साहब ने, सो बवाल मच गया। देखते ही देखते टीवी पर स्पेशल सीरीज के साथ साथ ट्विटर पर भी मोर्चे खुले। जनरल साहब को पता था कि किस मोर्चे पर वो मज़बूती से डटे रहे सकते हैं सो उन्होंने वही मोर्चा खोला।
टीवी पर बयान देने के लिये वो उपलब्ध नहीं थे। जिबूती और सना के बीच में कोई पत्रकार उन्हें दौड़ा नहीं सकता था इसलिये जनरल साहब ने दूर से ही खेल किया। ट्वीट दागा..यहां तो बारूद था ही फट पड़ा...। जनरल साहब का काम बन गया। अर्णब इस बार जनरल के मोर्चे पर फंसते दिखाई दिये। उन्होंने एक हैश टैग शुरु किया, #AbsusiveMinister. ये थोड़ा माइलेज लेने ही वाला था कि जनरल के समर्थन में नया हैशटैग आ गया #HatsOffGeneral..अब लड़ाई के लिये यही मोर्चा सैट हो गया। अर्णब को अपनी टीवी बिरादरी से उतना समर्थन नहीं मिला जिसकी वो उम्मीद कर रहे थे, सो जनरल साहब के समर्थकों का हमला भारी पड़ने लगा। आज दिनांक 9 अप्रेल 2105 की सुबह 11 बजे तक 1 लाख 12 हज़ार से ज्यादा लोग #HatsOffGeneral पर ट्वीट करके वी के सिंह को अपना समर्थन दे चुके थे।

ये लड़ाई चल ही रही थी कि #Presstitutes हैश टैग ने धमाल मचा दिया। इस हैश टैग पर एक नारा वीके सिंह के समर्थन में लगता तो दूसरी गाली मीडिया को पड़ रही थी। जिसके दिल में जो आया उसने वही लिखा। ट्विटर की इस जंग में मीडिया को जितनी गालियां इस बार पड़ी हैं उतनी मैने कभी नहीं देखी। जनरल ने मोर्चा खोला था..वो उसमें विजयी दिखाई देने लगे। बीजेपी पहले ही पल्ला झाड़ चुकी है, प्रधानमंत्री 9 दिन के लिये बाहर हैं वो तो फुटेज खायेंगे ही।

कुल मिलाकर टीवी न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया के बीच कड़ी प्रतिद्वन्दिता की शुरुआता का ये एक बेहतरीन नमूना था। टीवी न्यूज़ चैनल्स ने कई बार ऐजेंडा सैट करके बढ़त लेने की कोशिश की है लेकिन 24 घंटे के अंदर 2 लाख से ज्यादा लोगों का ट्विटर पर समर्थन हासिल करना जनरल वीके सिंह का कौशल ही है।
और एक बात ट्विटर पर पूरी बातचीत के दौरान बात पूरी भारतीय मीडिया की होती रही, किसी ने भी टीवी या अखबार में फर्क नहीं किया और ये भी लिखा की ये मीडिया वाले हमें अब मूर्ख नहीं बना सकते। ये विचार खतरनाक नहीं है?

Tuesday, February 10, 2015

दिल्ली का वट वृक्ष क्यों रोया ????

अहंकारो के पर्वतों को ध्वस्त करके धूल उड़ाता एक परिणाम..आहलादित कर देने का एक अवसर है..अवसर की विवेचना सबके लिये नूतन सी है..एक वो जिनके मस्तक पर वर्षों के तप और संघर्ष से दीप्त हुआ तेज रहता था एकाएक मानो गहन अंधकार और दुर्गंध से भर गया है...वनस्पति विज्ञान में विधा है..कलम लगाने की..ये कलम इसलिये लगाई जाती है कि नये और रचनात्मक रस लिये हुए फल प्राप्त हों..लेकिन उस पर जड़ों में कोई आघात नहीं किया जाता..कलम को पौधें की एक शाख से ही जोड़ा जाता है..यहां तो दिल्ली के वट वृक्ष को बीच से काटकर कलम लगाने की कोशिश की गई..जड़ें तो कभी बुरा नहीं मानती लेकिन ये तने रूठ गये..ऊपर से पानी बरसता रहा लेकिन उसे पहले जड़ें और फिर तने ही तो फूल पत्तियों तक पंहुचाते हैं..सो वो नहीं पंहुचा पाये..पंहुचाना ही नहीं चाहा..उद्यान जिसके निर्देशन में था वो इस संयोग से खुश था कि कोई हल चला गया, किसी ने पानी दे दिया और कोई खाद डाल देगा...गहन कुंभकर्णी नींद..ये निद्रा उस अचेत अवस्था से बुरी थी..जो किसी प्रहार से मूर्छित होने के बाद होती..यहां तो सफलता ने मूर्छित कर दिया..लेकिन प्रकृति का न्याय देखिये..सत्ता का संतुलन हाथों हाथ हो गया..दंभ कभी नहीं टिका..आज क्या टिकता..बरगद की पुरानी जड़ें उन नन्हे कोपलों के लिये आंखों से नीर बहा रही हैं जो कल इस उद्यान में नये वृक्ष बनकर सुगंध फैलाते...लेकिन माली के गलत फैसलों ने वृक्ष पर इतना गहरा प्रहार किया कि जड़, तने सब विश्वास खो बैठे...
इस दंभ ने एक स्वप्न का भी संहार कर दिया...और अब वर्षों से चले आ रहे यज्ञ में स्वयं विध्वंस की आज्ञा सी दे दी। उन स्थानो का भाग्य सदा अश्रु बहाने के लिये होता है...ये इतिहास में पढ़ा था..अब भोग कर साक्षी बन रहे हैं...कुछ कुछ द्वापर युग के महाभारत का स्मरण हो जाता है..जब द्यूत में अहं युद्धिष्ठिर की बुद्धि को भ्रमित कर बैठा और उसने द्रोपदी को दांव पर लगा दिया...फिर क्या था..ले आये दु:शासन द्रौपदी को भरी सभा में..प्रजाजनों ने भी आनंद सा ही लिया...कौन क्या करता...अपराध धर्मराज ने किया था...बांसुरी वाले मोहन आये और अपना कर्तव्य पूरा कर गये...
कहानी तो इससे आगे भी है...आपको पता भी होगा...लेकिन ये बालुकामय पुलिन..उड़ उड़ कर आंखों पर पड़ते रहे..राजा प्रजा सब इससे पार पाने का कोई उपाय न खोज सके..हाथों में मिर्च लिये द्यूत अट्टाहस करता रहा..प्रजा आनंद प्राप्त करती रही...बादलों के बीच नगर बसाने की कल्पना से भला कौन अपना तप नहीं छोड़ देगा...धरातल का कोई मोल नहीं था, बादलों का महल किसे नहीं चाहिये...सो वो मिल रहा था...कल्पनाओं के सागर में हिलोरें ले रही प्रजा को ..द्यूत ने पलटने का मौका नहीं दिया..द्यूत मौका देता भी नहीं है...सो परिणाम आ गया..
अब राजा प्रजा से खफा है...अपने मंत्रियों से भी..वो सोने की तैयारी तो नहीं कर रहा?

Monday, December 8, 2014

टुट गई तड़क कर के

गुरदास मान का गाया एक प्रसिद्ध गीत है....लाई बेकदरां नाल यारी..टुट गई तड़क कर के। 5 दिसंबर की रात दस बजे दुनिया की नामी कंपनी की टैक्सी ने लड़की को कार में बिठाया, कार में बिठाने के दस मिनट के बाद ही उसके साथ रेप किया, उसके घर के पास उतारा और रफूचक्कर हो गया। लड़की ने शिकायत की पुलिस हरकत में आई और जब आरोपी की पड़ताल हुई तो पुलिस के होश उड़ गये।
आरोपी दिल्ली ही नहीं दुनिया की नामी कंपनी में ड्राइवर था, उसका कोई पुलिस वैरिफिकेशन नहीं करवाया। आरोपी शिव कुमार यादव पर
साल 2011 में महरौली थाने में केस दर्ज हो चुका था, दिल्ली पुलिस के पास उसका क्रिमिनल रिकॉर्ड था बावजूद इसके उबर कंपनी ने उसका कोई वैरिफिकेशन नहीं करवाया, यही लापरवाही थी कि उसे नौकरी मिली, हद तो तब हो गई जब ये पता चला कि इसी साल मई में दिल्ली के एडिशनल डिप्टी कमिशनर ने उसको एक चरित्र प्रमाण पत्र जारी किया जिसमें ये कहा गया कि शिव कुमार यादव के खिलाफ कोई क्रिमिनल केस दर्ज नहीं है। घोर लापरवाही की दो मिसालें।
ये लापरवाही उस दिल्ली एनसीआर में हुई है जहां ठीक दो साल पहले रेप की एक वारदात ने पूरी दुनिया को दहला दिया। दुनिया भर के नियम कायदे पहले बनाये गये फिर लागू कर दिये गये, लेकिन सुरक्षा का आलम फिर इस पांच दिसंबर को सामने आ गया। थोड़ा गहराई में जायें तो पता चलेगा कि नये नियम कायदे बन तो गये लोकिन वो बेअसर हैं, उनसे कोई नहीं डरता और जो डरता है वो ये बात भली भांति जानता है कि इन नियम कायदों को तोड़ा कैसे जाता है।
दिल्ली पुलिस के एडिशनल डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर से एक सर्टिफिकेट जारी होना जो खास तौर पर ये तस्दीक करता हो कि शिव कुमार का कोई आपाराधिक रिकॉर्ड नहीं है कई सवाल खड़े कर रहा है। दिल्ली पुलिस के इस तरह के सर्टिफिकेट किस आधार पर जारी करती है? इस सर्टिफिकेट को जारी करने से पहले क्या पूरी जांच की जाती है या फिर उस दफ्तर में भी सर्टिफिकेट बनाने वाले दलालों ने अपना जाल बिछा रखा है जो रुपये लेकर चरित्र प्रमाण पत्र दिलवा देता है? सवाल गंभीर है अगर सर्टिफिकेट सही तो दिल्ली पुलिस की बड़ी जिम्मेदारी बनती है क्योंकि अगर उबर कंपनी आरोपी शिव कुमार से सर्टिफिकेट मांगती भी तो एडिशन डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर से जारी सर्टिफिकेट कंपनी को प्रारंभिक तौर पर संतुष्ट करने के लिये काफी है।
हालांकि इससे कंपनी की जिम्मेदारी कहीं भी कम नहीं होती। जिस गाड़ी में वारदात हुई वो आरोपी के नाम पर रजिस्टर्ड है, दिल्ली में जिस पते पर गाड़ी का रजिस्ट्रेशन है उसका भी पता नहीं। दुनिया की नामी कंपनी की गाड़ी में जीपीएस नहीं है जो हैरान करने वाली बात है। कंपनी की लापरवाही का आलम ये है कि ड्राइवर का कोई वैरिफिकेशन तक नहीं हुआ।
लापरवाही की ये दो मिसालें तब आई हैं जब दिल्ली दुनिया के सबसे वीभत्स रेप कांड की गवाह बन चुकी है, तब भी सबसे ज्यादा बदनामी उसी दिल्ली पुलिस की हुई जिकसे अफसर ने आज ये सर्टिफिकेट जारी किया, और दूसरी तरफ बड़ा आरोप फिर एक ट्रांसपोर्ट कंपनी और उसके ड्राइवर पर आया। दोनों ही कांडों में गाड़ी और गाड़ी का स्टाफ।
दिल्ली  पुलिस  ने उस वक्त ट्रांसपोर्टर्स को कसमें दिलवाईं और व्यापारियों ने कसमें खाईं..लेकिन सुरक्षा हवा हवाई हो गई। किसी ने कदर नहीं की न नियमों की न कसमों की..शायद इसी लिये गुरदास मान का गीत ठीक ही है कि लाई बेकदरां नाल यारी, टुट गई तड़क करके......



 

Wednesday, October 8, 2014

पाकिस्तान की खुजली का बाम है बम

पाकिस्तान के ज़ख्मों पर जब जब खुजली होती है वो उन्हें नोचने लगता है। ये ज़ख्म कुदरती हैं। ठीक वैसे ही जैसे किसी बच्चे को पैदाइशी रोग होता है। कुछ रोगों का इलाज हो जाता है लेकिन अधिकांश पैदाइशी रोग लाइलाज होते हैं। उनका अन्त मृत्यु के साथ ही हो पाता है। पाकिस्तान जब जब अपने ज़ख्मों को नोचता है तब तब वो भारत पर हमले करता है। पहले ये हमले आमने सामने होते थे..1971 के बाद हमले साये में होने लगे। 
हाल फिलहाल के दिनों में नियंत्रण रेखा और अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर हो रही गोलीबारी उसी खुजली का नतीजा है। इस ज़ख्म को पाकिस्तान इतनी बार खुजला चुका है कि वो उसके लिये नासूर बन चुका है। उसे इस ज़ख्म का इलाज ही खुजलाने में नज़र आता है। ये कहावत सब जानते हैं कि वक्त कई बार ज़ख्मों को भर देता है, लेकिन उसके लिये भी शर्त ये होती है कि ज़ख्म खुजलाये न जांय। 
भारत से अलग हुआ पाकिस्तान जिस मकसद से जीता है उसे हिंदुस्तान में बैठकर समझना थोड़ा मुश्किल है। पाकिस्तान की संरचना का आधार ही अलग है। वो अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करने वाले देश से ज्यादा भारत को परेशान करने वाले एजेंडे को अपनी राष्ट्रीय पहचान बना चुका है। उसकी सांसे तब तक चलती हैं जब तक उसकी ज़मीन से भारत के खिलाफ उथल पुथल की या तो साज़िश हो रही हो या फिर गोलाबारी। 

तय मान लीजिये इसमें पाकिस्तान की सियासत का कोई कसूर नहीं है। बिलावल भुट्टो कशमीर पर बयान देकर कितना ही अपना मज़ाक उड़ावा लें लेकिन पाकिस्तान के किसी नेता की ये ताकत ही नहीं कि वो कशमीर ये भारत के साथ अपने रिश्ते के बारे में कोई फैसला ले सके। अगर ये संभव होता तो ताशकंद, शिमला और लाहौर के घोषणा पत्र पाकिस्तानी सरकार के दफ्तरों में धूल नहीं खा रहे होते। इस बार संयुक्त राष्ट्र के अपने संबोधन में ही नवाज़ शरीफ कह चुके हैं कि अब शिमला समझौता कोई समाधान नहीं देता इसलिये उससे आगे बढ़ा जाय। अगर किसी समझौते की बारीकियों में न जाना चाहें तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा और उसके बाद करगिल के युद्ध का प्रत्यक्ष उदाहरण ले लीजिये। यही बात शिमला समझौते के तुरंत बाद भी दोहराई जा सकती थी, लेकिन उस वक्त पाकिस्तान के पास इतनी हिम्मत नहीं बची थी। ताशकंद के बाद देख लीजिये 1965 में समझौता हुआ और 1971 में वो फिर लड़ाई के लिये तैयार था। पाकिस्तान पाई पाई जोड़ता है, विदेशी ताकतों से अपना रोना रो रो कर पैसा ऐंठता है और जो कुछ बच जाता है उसे भारत के खिलाफ झोंक देता है। 

पाकिस्तान की सेना वहां की विदेश और रक्षा नीती को इस तरह से कस कर पकड़ के रखा है कि पाकिस्तान के सियासतदां लाख सर पटक लें लेकिन वो सेना के इस चंगुल से नहीं छूट सकते।  अगर पाकिस्तान की सियासत के सबसे ताकतवर नेता का नाम लेना हो तो मुहम्मद अली जिन्ना के बाद जुल्फीकार अली भुट्टो का ही नाम ज़ेहन में आता है। ये वही भुट्टों हैं जिन्होंने 1971 में पाकिस्तान की कमर टूटने के बाद शिमला में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री से समझौता किया और दूसरे ही दिन सेना के दबाव में उससे मुकर गये।  

अब तो पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश है इसलिये भारत और पाकिस्तान के बीच किसी निर्णायक युद्द की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। कुछ विश्लेषक तो यहां तक मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच के संघर्ष का अंत आने वाली कुछ पीढ़ियां तो नहीं देख पायेगी। इस संघर्ष का अंत बड़े बदलाव से शुरु होगा। ये बदलाव तब होगा जब पाकिस्तान की सेना उनके प्रधानमंत्री का सम्मान करेगी। जब वहां भारत के विरोध को राष्ट्रीय एजेंडे से हटा कर अपने विकास का एजेंडा बनाया जाएगा। 

उम्मीद की जाय की ये पीढ़िया इस बदलाव की करवटें तो देख ही लें। आखिर दोनों तरफ इंसान ही बसते है। 

Friday, June 29, 2012

बेटी की विदाई के समय गिदारों द्वारा गए जाने वाला कुमांऊनी संस्कार गीत

(1) बेटी की विदाई के समय गिदारों द्वारा गए जाने वाला कुमांऊनी संस्कार गीत ------- हरियाली खड़ो मेरे द्वार , इजा मेरी पैलागी ,इजा मेरी पैलागी | छोडो -छोडो ईजा मेरी अंचली,छोडो -छोडो काखी मेरी अंचली , मेरी बबज्यु लै दियो कन्यादान , मेरा ककज्यु लै दियो सत्यबोल , इजा मेरी पैलागी | इजा मेरी पैलागी | छोडो -छोडो बोजी मेरी अंचली , छोडो -छोडो बहिना ,मेरी अंचली , मेरे भाई लै दियो कन्यादान , मेरे भिना लै दियो सत्यबोल, इजा मेरी पैलागी | इजा मेरी पैलागी | छोडो -छोडो मामी मेरी अंचली , मेरे मामा लै दियो कन्यादान , इजा मेरी पैलागी ,इजा मेरी पैलागी |....................................................... (2) बेटी की विदाई के समय का कुमांऊनी संस्कार गीत _ काहे कि छोडूँ मैं एजनी पैजनी काहे कि लम्बी कोख ए ? बाबु कि छोडूँ मैं एजली पैजली माई कि लम्बी कोख ए | काहे कि छोडूँ मैं हिल मिल चादर , काहे कि रामरसोई ए , भाई कि छोडूँ मैं हिल मिल चादर , भाभि कि रामरसोई ए | छोटे - छोटे भाईन पकड़ी पलकिया हमरी बहिन कांहाँ जाई ए , छोडो - छोडो भाई हमरी पलकिया , हम परदेसिन लोक ए | जैसे जंगल की चिड़ियाँ बोलै , रात बसे दिन उडि चलै , वैसे बाबुल का घर हम धिय सोहें , रात बसे दिन उडि चलै | बाबुल घर छाडी ससुर का देस , छाड़ो तुम्हारो देस ए , भाईन घर छाडी जेठ का देस , छाड़ो तुम्हारो देस ए | माई कहे बेटी नित उठि अइयो, बाबु काहे छट मास मे, भाई कहे बैना काज परोसन ,भाभि कहे क्या काज ए || ( कुमांऊँ का लोक साहित्य )

Sunday, January 22, 2012

आत्मसम्मान की लड़ाई पर सरकारी हथौड़ा



दिनेश काण्डपाल

भारत के इतिहास में पहली बार सेना के जनरल ने सरकार को सरेआम चुनौती दी है। थलसेना प्रमुख जनरल वी के सिंह अपने सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन दूसरा पक्ष इस पर अनुशासन की दलीलें देकर असली मुद्दे को भटकाना चाहता है। अपनी जन्मतिथि के बारे में जनरल सिंह अपनी कई बार सेना को लिख चुके थे लेकिन इसका समाधान नहीं हो पाया। अब कई स्वार्थों की वजह से वी के सिंह को निशाना बना कर न केवल उनकी गरिमा बल्की सेना के मनोबल को भी दांव पर रखा जा रहा है, ज़ाहिर है ये सब सरकार कर रही है कोई दूसरा नहीं।
क्यों निशाना बने हैं जनरल
इस कहानी के पीछे वही आदत है जिस आदत ने छोटे स्वार्थों की खातिर कई बार देश के सम्मान को दांव पर रखा है। अन्दर की कहानी ये है कि जनरल सिंह की जन्मतिथि को अगर 1951 मान लिया जाय तो सरकार के कुछ चहेते जिन्दगी भर वो हासिल नहीं कर पाएंगे जो उन्हें वी के सिंह की इज़्जत उतारने के बाद अभी मिल जाएगा। यहां पर याराना भी है और कमज़ोरी भी। जनरल सिंह को इसलिये भी पसंद नहीं किया जाता है क्योंकि वो वैसा कुछ नहीं करते जो सरकार के ही हित में हो। आदर्श सोसाईटी घोटाले में जिस तरह से सेना प्रमुख ने सक्रियता दिखाई वो कई रहनुमाओं को पसंद नहीं आया लेकिन उस वक्त उनके हाथ बंधे थे। जिस तरह से सुकना ज़मीन घोटाले में लेफ्टिनेंट जनरल अवधेश प्रकाश का कोर्ट मार्शल हुआ उस पर भी तकलीफ तो कई दिलों को हुई लेकिन वीके सिंह का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सका। अपने कार्यकाल में जिस तरह से जनरल वी के सिंह ने साहस के साथ निर्णय लिये है वो कुर्सियों को जागीर समझने वालों के लिये बैचेनी पैदा कर रहे हैं। यही बैचेनी सेना प्रमुख को घेरने की कोशिशों में लगी है।
चीफ ने क्या किया ?
वी के सिंह को जब जन्म तारीख की विसंगतियों का पता चला कि उन्होंने उसी दिन से चिठ्ठी लिखनी शुरू कर दीं। सैनिक जीवन में अनुशासन का घोटा पी चुके जनरल के पास इसस् ज़्यादा करने के लिए कुछ था भी नहीं। यहां पर अब हैसियत बदल चुकी थी। एनडीए का ये कैडेट अब सेना प्रमुख है और सरकार उन्हें इस तरह बदनाम कर रही है मानो उन्होंने इरादतन अपनी उम्र छिपा कर फायदे लिये हों। ये मुद्दा एक इंसान के आत्मसम्मान का बन चुका था। 13 लाख सैनिकों के फौज की अगुवाई करने वाले जनरल पर इस तरह की बातें करने वाली सरकार ने एक पल के लिए भी उनके मनोबल के बारे में नहीं सोचा। इस विवाद के बाद भी कोई कदम बढ़ाने से पहले सिंह ने भारत के तीन मुख्य न्यायाधीशों से राय ली और सबने उनके पक्ष में सलाह दी।
अब क्या होगा ?
ज़ाहिर है सरकार के पास ताकत है साधन हैं और बदनीयति भी है। जनरल वी के सिंह को इस बात के लिए मजबूर कर दिया जाएगा कि वो मई तक रिटायर हो जाएं और सरकार के फैसले को मान ले। दूसरा रास्ता जनरल के पास तो है लेकिन वो स्वाभिमानी व्यक्ति होने के साथ साथ इस बात का ख्याल रखने वाले भी हैं कि सरकार के साथ किसी भी तरह का क़ानूनी विवाद आगे ग़लत परंपरा को जन्म दे सकता है। इस परिस्थिति में विक्रम सिंह अगले थल सेना प्रमुख बनेंगे और उनको को तैयार रहने के संकेत दिये जा चुके होंगे। अगर जनरल वी के सिंह मई 2012 तक रिटायर नहीं होंते हैं तो विक्रम सिंह थल सेना प्रमुख नहीं बन पाएंगे।
अब माफी का मतलब ?
जनरल वी के सिंह की उम्र विवाद के लिये जिस तरह से रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने माफी मांगी है वो भी संकेत है कि सरकार को मामले की गंभीरता का पता तो था लेकिन अपनी गोटियां फिट हो जाने तक वो चुप रही और तमाशा होता रहा। क्या रक्षा मंत्री का वक्त पर किया गया एक फोन थल सेनाअध्यक्ष के साथ हुए इस हादसे को जनता के बीच जाने से नहीं रोक सकता था। अब माफी का मतलब है कि चिड़िया खेत चुग चुकी है। देश ने एक गलत उदाहरण देख लिया है और ये भी देख लिया है कि छोटे स्वार्थों के लिये सरकार किस हद तक जा सकती है।

ये विवाद दुर्भाग्यपूर्ण है। इसमें से क्षेत्रवाद और निजी पसंद की बू भी आती है। ये एक बड़े वर्ग की साज़िश का भी संकेत है जो ज़ाहिरा तौर पर देश के लिये ठीक नहीं है।

Tuesday, May 3, 2011

पोस्ट लादेन नया बाज़ार

दिनेश काण्डपाल

लीबिया में गद्दाफी के बेटे के मारे जाने के बाद जो प्रतिक्रिया आई उससे एक आतंक फैला, ये आतंक अमेरिकी नीतियों की देन समझा जाने लगा। आतंकित अमेरिका ने इसी वक्त ओसामा बिन लादेन को मौत की नींद सुला दिया। अमेरिकी नौसेना की सील्स कमांडो जिस तरह 40 मिनट में ऑपरेशन पूरा करके निकल गये वो तत्परता बाज़ार पर आतंक फैलाने में भी दिखाई जा रही है। नाटो जिस तरह से लीबिया में कारवाई कर रहा है उसे सही ठहराने वाले लोगों की तादात कम होती जा रही है। नाटो की कारवाई पर रूस और चीन का कड़ा विरोध उन लोगों के लिए चिन्ताएं पैदा कर रहा था जिनको लीबिया और उसके आस पास अपना साम्राज्य खड़ा करना था। ये बाज़ार का साम्राज्य होने वाला था।
बाज़ार के इस टकराव को हर कोई समझ रहा है। रूस के प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन की तल्ख टिप्पणियां ये बता रही हैं कि उनका विरोध न केवल स्पष्ट है बल्कि टकराव पैदा हो सकने की स्थिति के लिए भी वो तैयार हैं। पुतिन ने कहा कि लीबिया को उड़ान प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करना एक मध्ययुगीन फैसले जैसा है। पुतिन ने सवाल खड़े किए कि वहां बम क्यों बरसाए जा रहे हैं। ये कैसा उड़ान प्रतिबंधित क्षेत्र है जहां रात में नाटो के जहाज बम बरसा रहे हैं। चीन के सान्या शहर में ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में जो साझा घोषणा पत्र तैयार हुआ उसमें भी लीबिया पर नाटो के हमलों की आलोचना की गई। यूरोपीय संघ इस पर हैरान था तो संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत सूजेन राइस ने जिस तरह लीबिया में बलात्कार का मामला उठाया उस पर ज़्यादातर कूटनीतिज्ञ मान रहे थे कि ये रूस और चीन को लक्ष्य करके दिया गया बयान है।
जिस वक्त गद्दाफी ने लीबिया की कमान सम्हाली उस वक्त वहां पर 13 प्रतिशत साक्षरता थी जो अब 93 फीसदी हो गई है। लोकिन पढ़ लिख चुके लीबिया के नागरिको को नया बाज़ार गद्दाफी ने देखने नहीं दिया। गद्दाफी ही नहीं इस लिस्ट में शावेज भी हैं जो कई धनकुबेरों की नज़रों में खटक रहे हैं।
बाज़ार के पुजारी हर परिभाषा में मसीहा और आतंकी में कोई फर्क नहीं करते। किसी का मसीहा उनके लिए किसी भी पल आतंकी हो सकता है, और उनकी दुकान का शटर उठाने वाला राजा बनने का नाटक कर लेता है। पोस्ट लादेन बाज़ार के ये समीकरण भी बदलने जा रहे हैं।