Friday, May 28, 2010

एक पल की तस्वीर बनाई है मैने

एक पल की तस्वीर बनाई है मैने
चटख रंग नहीं हैं उसमें लेकिन
कभी धुंधली नहीं पड़ती
धड़कन है धड़कती रहती है

ताजा रहती है हर वक्त
और
जब कभी आंखो के आगे आती है
तो केवल मुस्कुराहट और आह लाती है

फिर उस पल को जीने की तमन्ना
उस तस्वीर में कुरेदने लगती है
उस पल की सच्चाई को
जिसे मैने झूठ कह दिया कई बार

दिन में सपने की तरह
आंखे खोल कर रोंगेटों को सरसराती जाती है
वो तस्वीर उस पल की धड़कन
को जिंदा रखती है हर बार

वो पल इस तस्वीर में सांसे लेता है
और याद करता है
कैसे आंखों के आगे कुछ रंग
मिलजुल कर एक तस्वीर बना गये।



दिनेश काण्डपाल

Monday, March 22, 2010

चरागे सहर हूं, बुझा चाहता हूं


ये पंक्तियां भगत सिंह ने अपनी शहादत से कुछ दिन पहले लिखी थीं.

.........उसे फिक्र है हरदम नया तर्ज –ए-जफा क्या है.......

हमें ये शौक है देंखें सितम की इन्तहा क्या है......

कोई दम का मेहमां हूं ए एहले महफिल.....

चरागे सहर हूं, बुझा चाहता हूं.......

हवा में रहेगी मेरे खयाल की बिजली........

ये मुश्तके खाक है, फानी मिले न मिले......

सितम्बर 27, 1907 ------ मार्च 23, 1931

Saturday, February 20, 2010

आई जी का नकाब कौन पहनेगा






दिनेश काण्डपाल


चेहरे पर नाकब लगा कर इस्टर्न फ्रंटियर राईफल्स के आईजी ने प्रेस कॉंफ्रेस की। अपनी प्रेस कॉफ्रेंस में आईजी ने पश्चिम बंगाल सरकार पर गंभीर आरोप लगाये। आईजी ने कहा कि उनकी फोर्स के साथ अमानवीय बर्ताव हो रहा है। इस आईजी का नाम है विनय कृष्ण चक्रवर्ती और ये इस्टर्न फ्रंटियर के स्पेशल आईजी हैं। सिलदा के नक्सली हमले में इस्टर्न फ्रंटियर के ही 24 जवान मारे गये थे। अपनी जवानों की मौत से घबराये और आहत आईजी ने जब प्रेस कॉंफ्रेस की तो चेहरे पर नाकब बांध लिया। फौरी तौर पर ये खबर देखने के बाद लगता है कि आईजी नक्सलियों से डर गया है वो अपना चेहरा कैमरे पर नहीं दिखाना चाहता। लेकिन सोचिये कोलकाता में आईजी रैंक का अफसर प्रेस कॉंफ्रेंस करता है और वो भी चेहरे पर नकाब डाल कर। क्या आईजी का मकसद केवल अपना चेहरा छिपाना है या कई चेहरों से नकाब खींचना।
ये तीखा सवाल है। उन आरोपों पर गौर कीजिये जो इस आईजी ने लगाये हैं। आईजीने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार इस्टर्न फ्रंटियर के साथ अमानवीय बर्ताव कर रही है। आईजी ने कहा कि उनके पास बुनियादी चीजों की कमी है फिर भी वो खतरनाक माओवादी इलाकों में लोहा ले रहे हैं। आईजी की खीझ और गुस्सा जब प्रेस के सामने आया तो उसके खुद के चेहरे पर नकाब पड़ा गया। जाहिर सी बात है इस प्रेस कॉफ्रेंस के तुरंत बाद राज्य सरकार ने आई जी को सस्पेंड कर दिया। सरकार वही कर सकती थी, और करना भी यही चाहिये था।
आई जी ने इस तरह की प्रेस कॉंफ्रेस करके हज़ारों सैनिको का मनोबल तोड़ने की कोशिश की है जो नक्सलियों के खिलाफ अभियान में जुटे हैं। आईजी की इस कायराना हरकत की सजा उसे मिलनी चाहिये। लेकिन आईजी के सवालों को भी उतनी ही गंभीरता देनी होगी जितनी उसके नकाब को दी गयी। आईजी की इस प्रेस कॉंफ्रेस को पुलिस रूल का उल्लंघन माना गया और सरकार ने 24 घंटे से पहले आईजी को तो निलंबित कर दिया। लेकिन सरकार ने ये नहीं बताया कि इस वक्त जो जवान नक्सलियों के गढ़ में कैंप लगाये बैठे हैं उनकी सुरक्षा के लिये क्या किया।
आईजी की इस हरकत ने सरकार पर सीधे आरोप लगा दिये हैं। पश्चिम बंगाल सरकार का दामन दागदार भी हो गया है। जो सावाल आईजी ने उठाये हैं वो एक सैनिक का दर्द है जो हर वक्त मौत के मुंह में खड़ा है और उसके पास अपना बचाव के हथियार भी नहीं है। सिलदा हमले में हमने देखा कैसे नक्सली दो दिन पहले तक हमले की तैयारी करते रहे लेकिन खूफिया एजेंट पता नहीं लगा सके। आईजी तो यहां तक कह रहा था कि सरकार को सब पता है लेकिन वो न जाने क्यों कुछ नहीं कर रही।
देश के बहादुर नौजवान सियासतदानों के खेल में अपनी जान गंवा रहे हैं। आईजी की हरकत बता रही है कि ऐसा ही चलता रहा तो अब पुलिस वाले भी नकाब पहन कर नक्सलियों से निपटने की ट्रेनिंग लेने लगेंगे। समझ में नहीं आता कि ऑपरेशन ग्रीन हंट के सेनापति चिदंबरम इतने बेबस कैसे हो सकते हैं। गृह मंत्री जिस राज्य में माओवादियों को खत्म करने का खाका खींच कर आये वहीं उनके 24 बहादुर जवानों को घर में घुस कर मार दिया गया। ये बेबसी आईजी की ही नहीं है मंत्री जी हालात यहां पर काबू में नहीं आये तो कल ये नकाब जो आज आईजी ने लगाया है गृह मंत्री और प्रधानमंत्री को भी लगाना पड़ सकता है।

Thursday, February 18, 2010

सरकारी लापरवाही ने मारा 24 जवानों को

दिनेश काण्डपाल
घातक गलतियों ने 24 जवानों को मार डाला। पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में नक्सिलियों ने शाम को जिस वक्त कैंप पर हमला किया उस वक्त ये जवान अपने हथियारों से दूर ट्रेक सूट पहन कर खाना बना रहे थै। आने वाले खतरे से अन्जान ये जवान इस तैयारी में थे कि कैसे जल्दी खाना बने और दिन भर की थकान मिटायी जाय। कैंप में केवल एक संतरी था। सामान्य तौर पर रेत के बोरे कैंप के आस पास रखे जाते हैं लेकिन सिलदा के कैंप में एसा कुछ नहीं था। कोई ऊंचा टावर भी नहीं था जिस पर चढ़ के देखा जा सके की कौई कैंप की तरफ आ रहा है। बड़ी लापरवाही से योजना बना कर इन जवानों को मौत के मुंह में धकेलने का इंतजाम किया गया। नक्सिलियों ने हमले के अपने परंपरागत तरीकों से हटकर जीप और मोटर साईकिलों का सहारा लिया। धड़धड़ाते हुये सौ से ज़्यादा नक्सली कैंप में धुसे और चूल्हे के पास रोटी सेक रहे जवानों पर अंधाधुध फायरिंग शुरू कर दी। एक संतरी था जाहिर है इस अतिसंवेदन शील इलाके में वो काफी नहीं था। नक्सिलयों ने कैंप को आग लगाई, नौ जवान तो उसी आग में जल कर मर गये। आग से बचने के लिये जो बाहर भागे उन्हें बाहर खड़े नक्सलियों ने भून डाला। बेबस जवान अपनी की मौत का तमाशा देखते देखते मर गये। नक्सलियों ने वो सारे हथियार लूट लिये जो कैंप में रखे थे।
ये हमारी तैयारी है नक्सिलियों से निपटने की। इस वक्त कोई 60 हज़ार जवान नक्सलियों से निपटने की स्पेशल ट्रेनिंग ले रहे हैं। सिलदा में मारे गये जवानों के पास कोई स्पेशल ट्रेनिंग नहीं थी। उन्हें कोई अंदाजा नहीं था कि उनके इस कैंप में इतना बड़ा हमला हो सकता है। नक्सलियों ने अचानक इस हमले को अंजाम नहीं दिया। आने जाने वाले रास्तों पर सुंरगे बिछा कर नक्सिलयों ने इस बात को सुनिश्चित किया की कोई इस कैंप में मदद के लिये न पंहुच पाये। बारूदी सुरंगे तकरीबन 24 घंटा पहले बिछायी गयी होंगी। इस काम के लिये भी सौ से ज़्यादा लोग लगे होंगे। लेकिन जनता की गाढ़ी कमाई के टैक्स से तन्खवाह उठा रहे खूफिया एजेंसी के बेखबर एजेंटों को इस पूरी कारवाई की कोई खबर नहीं लग पायी। नक्सलियों ने बड़े आराम से कैंप पर हमला किया 24 जवानों को गोलियों से भूना और विजयी मुद्रा में कैप से चलते बने।
प्रधानंमत्री ने नक्सिलियों को देश की सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बताया। प्रधानमंत्री के बयान की गंभीरता तब दिखी जब देश के गृह मंत्री ने इस हमल के कुछ दिन पहले ही नक्सलियों से निपटने की रणनीति का खाका खींचा। कोलकाता में मुख्यमंत्रियों से बैठक कर चौड़ी छाती करते हुये टीवी कैमरों के सामने नक्सलियों को चुनौती दी। ऑपरेशन ग्रीन हंट को लेकर खूब बड़बोलापन किया। एक हमले ने इस बड़बोलेपन की हवा निकाल दी। सरे आम सारी योजनाओं की धज्जियां उड़ा दी। अब किसी की इतनी हिम्मत भी नहीं हो रही कि को इन हमलों की निंदा तक कर सकें।
नक्सलियों से निपटने की हमारी क्या तैयारी है इस हमले ने उसकी पोल खोल दी है। कैंप के पास जरूरी तैयारी नहीं की गयीं। केवल एक संतरी ड्यूटी पर था। रेत के बोरे रखे जाने चाहिये थे लेकिन वहां नहीं रखे गये। कैंप के आस पास नज़र रखने का कोई इंतजाम नहीं। ये जंग से कम हालात नहीं हैं। उस अफसर का नाम तक सामने नहीं आया जिसके ऊपर कैंप की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। कौन अफसर था तो इस कैंप में ये देखने गया कि वहां जवानों की सुरक्षा के इंतजाम हैं या नहीं। जंग भी ऐसी जहां दुश्मन की पहचान तक नहीं है। किसे मारें किसे नहीं, सब अपने ही हैं इसी दुविधा में हर सिपाही है। एक खास ऑपरेशन में संवेदनशील इलाके में किस तरह का कैंप लगना चाहिये ये ट्रेनिगं पहले अफसरों को दी जानी चाहिये। बेहद गैरपेशेवराना रवैये ने जिन 24 बहादुरों को मौत के मुंह में धकेल दिया उन पर देश की अदालत में इरादतन हत्या का मामला चलाया जाना चाहिये। ये शर्मनाक लापरवही है उन लोगों की जो नक्सिलियों से लड़ने के लिये जनता का समर्थन मांगते हैं। जो अपने 50 हथियारबंद जवानों की रक्षा नहीं कर सकते वो किस मुहं से आम आदमी की सुरक्षा का भरोसा दिलाये घूम रहे हैं।
सिलदा के हमले ने चुनौती को दोगुना कर दिया है। 24 जवानों को तो मौत के मुंह में धकेल दिया अब भी न जाने कितने कैंप इस लापरवाही की मार झेल रहे हैं। नक्सलियों से निपटने की हमारी तैयारी की अगर ये तस्वीर है तो .ये शर्मनाक है।

Wednesday, November 11, 2009

Wednesday, April 22, 2009

मां के आंसुओं का जवाब जनता क्यों देगी वरुण ?



दिनेश काण्डपाल
क्यों भई वरुण गांधी? मां के आंसुओं का हिसाब जनता क्यों देगी? क्या ये आंसू करगिल में शहीद हुये कैप्टन सौरव कालिया की मां के हैं? या कैप्टन विक्रम बत्रा की मां रो रही हैं जिनका बेटा करगिल जीत कर शहीद हो गया। इन बहादुरों की मांताओं की आंखों से आंसूं नहीं निकलते। मुम्बई हमले के बाद एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की मां की आंखें याद हैं आपको, वो बहादुर बेटे की मां हैं। आंसू टपका कर ये अपने बेटे के शौर्य को कम नहीं करतीं। ये मांताऐं बेहद खामोशी और दृढ़ता से फिर से ऐसे ही शूरवीर बनाने में जुट जाती हैं जो फिर देश पर कुर्बान हो सकें। ये शौर्य और सहास की प्रतिमायें अपने आंसुओं का हिसाब मांगने चुनावी सभाओं में नहीं जातीं। कैप्टन सौरव कालिया जब शहीद हुये उसके बाद रक्षा बन्धन का त्यौहार आया, तब भी करगिल की लड़ाई चल रही थी। ऑल इंडिया रेडियो के लिये एक स्पेशल फीचर बनाने के लिये मैं सौरव की बहन से मिला, भरे हुये मन से मैने उनसे पूछा कि इस बार राखी पर सीमा पर खड़े फौजियों के लिये क्या संदेश देना चाहेंगीं। जो जवाब सौरव कालिया की बहन ने दिया उससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। उन्होंने कहा कि मैं अपने फौजी भाईयों से बस इतना ही कहना चाहती हूं कि बस अब हमारी तरफ से कोई शहीद नहीं होना चाहिये..अब जो भी लाश गिरे वो दुश्मन की होनी चाहिये। ये हमारे देश की मां बहनों का बानगी है।

क्या नौजवान नेता मां के आंसुओं को ढा़ल बनाता है ?

एक नौजवान नेता के चुनावी भाषण में क्या मां के आंसुओं का हिसाब मांगा जाना चाहिये। क्या मां के ऊपर कोई ज़ुल्म हो गया है। क्या मां को किसी ने कुछ कर दिया है। मां के आंसू तो अपने बेटे के लिये निकले हैं और बेटे की करनी पर कारवाई चल रही है, इसे देख कर ही तो मां रोई है। बेटे को कष्ट में देखेगी तो मां तो रोयेगी ही। क्या वरुण का कष्ट ऐतिहासिक कष्ट है। क्या मेनका के आंसू इतिहास बदलने जा रहे हैं। वरुण किस बात पर अपनी मां के आंसुओ का हिसाब मांग रहे हैं। हज़ारों मांओं की आंखों से आंसू पोछने की ज़िम्मेदारी जिसे अपने कंधे पर लेनी चाहिये वो अपनी मां के आंसुओं को पोछने के लिये वोट मांग रहा है।

कोई काम की बात क्यों नहीं करते हैं वरुण ?

कैसी वाहयात बात करते हैं ये नेता कि मायावती मां होती तो बेटे का दर्द जानती। मेनका का बेटा, बेटा और दूसरे के बेटे का क्या। कितने बेकसूर जेलों में सड़ रहे हैं उनका मेनका ठेका क्यों नहीं ले रहीं। वरुण ने जनता के बीच जाकर भाषण दिया है। अच्छा है या बुरा है, सही है या गलत है ये फैसले करने के लिये व्यवस्थायें लगी हुयी हैं। बड़ी अजीब बात है आप संवैधानिक संस्थाओं के सहारे भी चल रहे हैं, फिर आप अपने भाषण में भी मां के आंसुओं का हिसाब मांगने लगते हैं। जहां आपको ये बताना चाहिये कि आप जनता की सेवा किस तरह से करेंगे वहां आप मां के आंसुओं की ढ़ाल लेकर खड़े हो जाते हैं। अपने विरोधियों को आप ओसामा बिन लादेन बताने लगते हैं लेकिन आप क्या करेंगें ये बात आपकी ज़बान पर ही नहीं आती।

वरुण को इमोशनल मुद्दा ही क्यों सुहाता है?

क्या बात है? आखिर वरुण को इमोशनल मुद्दे ही क्यों रास आते हैं? पर्चा दाखिल करने से पहले वरुण ने जो भाषण दिया उसे कोई मनीषी आखिर बताये कि उसमें जनता के कौन से हित की बात की गयी है। पीलीभीत का विकास कैसे होगा। वहां की जनता की परेशानियां क्या हैं ये वरुण के भाषणों का हिस्सा क्यों नहीं होता है। हर वक्त इमोशनल कर देने वाली बांते। हिन्दू श्रोता खड़े हैं तो उनकी धार्मिक जज़्बातों वाली इमोशनल बाते कर दीं, जब सबकी नज़रें कड़ी हो गयीं तो मां के आंसुओं का हिसाब करने की बात करने लगे। राजनीति में वैसे ही पढ़े लिखे नौजवानों का टोटा होता जा रहा है, कोई राजनीति में आना ही नहीं चाहता। नेता पुत्र अपना वरचस्व बनाये हुये हैं ऐस में वरुण ज़रा अपने मन में पूछें कि उन्होंने कौन से आदर्श स्थापित कर दिये हैं।

क्या सिखा रहे हैं वरुण?

वायस आफ इंडिया पर एक टॉक शो में मैने बाहुबली नेता पप्पू यादव से पूछा कि आज के नौजवान पप्पू यादव से क्या सीखे....जो जवाब पप्पू ने दिया उस से मुझे शर्म आ गयी। पप्पू यादव ने कहा कि क्या बात कर रहे हैं आप आज के नौजवान हमसे कई बातें सीख सकते हैं..वो हमसे सीख सकते हैं कि कैसे लगन से जनता की सेवा की जाय..गरीबों की मदद कैसे की जाय..फिर हड़बड़ाते हुये पप्पू ने कहा और भी कई सारी बातें है जो नौजवान हमसे सीख सकते हैं ...लेकिन एक ठोस बात पप्पू यादव अपने बारे में नहीं बता सके कि आज का नौजवान पप्पू से क्या सीखे।

यहां पर मैं तुलना नहीं कर रहा हूं लेकिन अगर वरुण से भी यही सवाल पूछा जाय तो क्या जवाब आयेगा। वरुण क्या ये बतायेंगें कि जहां जनता को विकास की रोशनी दिखाने की बात करनी जाहिये वहां इमोश्नल तीर कैसे चलाये जाते हैं ये कोई नौजवान उनसे आकर सीख ले। राष्ट्रीय स्तर का नेता बनने का सपना देखने वाली वरुण क्या इस मुगालते में हैं कि वो इमोश्नल मुद्दों पर बहका लेंगें
एक तो नोजवान वैसे ही वोट देने घर से बाहर नहीं आ रहा ऊपर से ऐसे नेता अगर हो गये तो समझो बज गया लोकतंत्र का बैंड।

हम भी क्या इमोश्नल वोटर ही बने रहेंगें?

जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक भारत एक खोज पर जब श्याम बेनेगल ने धारावाहिक बनाया तो उसमें चाणक्य सेल्यूकस के दूत से कहते हैं कि भारतीय जनमानस मूलत: भवावेश में काम करता है इसलिये सोचने का शक्ति कई बार कुंद पड़ जाती है। इसी बात का फायदा उठा कर हर नेता ने इस जनमानस को हमेशा गलत दिशा दिखलायी है। हम क्या कर रहे हैं। हम भी क्या इमोश्नल वोटर ही बने रहेंगें। अगर आपने गजनी फिल्म दखी है तो उसमें आमिर का एक बेहतीरन डॉयलॉग है उस डायलाग में आमिर कहते हैं कि इंसान को जज़्बातों के साथ काम करना चाहिये, जज़्बाती होकर नहीं। इस डायलॉग से हिन्दुस्ताने के ज़यादातर वोटरों को सीख लेनी चाहिये। फर्क तो करना ही होगा। ये भी देखना होगा की कैप्टन सौरव कालिया, कैप्टन विक्रम बत्रा और मेजर संदीप उन्नीकृषण्न कीं मां क्यों अपने बेटे की शहादत पर आंसू नहीं बहाती हैं और वहीं,वोट मांगने के लिये बेटा अपनी मां के आंसुओं का हिसाब मांगने के लिये जनता को भड़काता है।

जूतामार लोग कायर हैं............




दिनेश काण्डपाल

बुश पर जूता चला तो फिर सीधा चिदम्बरम उसकी चपेट में आये। फिर नवीन जिन्दल और अब आडवाणी। जूता चलाने वालों सें मैं पूछना चाहता हूं कि क्या उनकी इतनी हिम्मत है कि वो मुख्तार अंसारी, शाहबुद्दीन, पप्पू यादव या डीपी यादव पर जूता चला सकते हैं। हमारे देश पर अभी तक जिस भी नेता पर जूता चला है उस पर कोई भी हत्या या लूट का मुकदमा नहीं है। उन पर बूथ लूटने का आरोप भी नहीं है और आप जब उनको हिन्दुस्तान का नेता कहते हैं तो आपको शर्म भी नहीं आती। जूता चलाने वाले ये कायर उन नेताओं पर जूता चलाने की हिम्मत भी नहीं कर सकते जो संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे मांगते हैं, उन पर भी जूता नहीं चला सकते जो अपनी बीबी के टिकट पर पराई नार को विदेश ले जाकर कबूतरबाज़ी करते हैं। चौरासी दंगें के दोषियों पर भी जूता नहीं चला सकते। अपना गुस्सा निकालने के लिये सस्ता रास्ता चुनने वाले इन कायरों को हीरो मत बनाईये। ये बेहद कमज़ोर लोग हैं। इनका कोई दीन ईमान नहीं हैं।

जूता चलाने से पहले ये कायर एक बार ये तो सोच लेते कि किस पर जूता चला रहे हैं। जरनैल सिंह हों या पावस अग्रवाल सब के सब कमज़ोर दिल और दिमाग के इंसान हैं। आडवाणी, चिदंबरम या नवीन जिन्दल कौन हैं, क्या ये जानते हैं ? मानता हूं एक लाख गुनाह किये होंगे इन तीनों नेतओं ने लेकिन क्या इनकी सज़ा इन तुच्छ लोगों का जूता है। 50 साल जिस शख्स ने इस हिन्दुस्तान की राजनीति को दिये उन आडवाणी की तरफ पावस अग्रवाल ने चप्पल उछाल दी। तिरंगे झंडे के लिये जिसने अपने जीवन के आधे दिनों तक लड़ाइ लड़ी उसके ऊपर एक शराबी ने जूता उछाल दिया। जो शख्स हिन्दुसातन में आर्थिक सुधारों को लाने वाली कोर दीम का हिस्सा रहा है, कई बार वित्त मंत्री और हमारे देश का गृह मंत्री है उस पर जूता उछालने के बाद जरनैल सिंह माफी मांगता है.

गुस्सा बिलकुल जायज़ है। इस व्यवस्था से भी और इस राजनीतिक दशा से भी। ये भी सच है कि पिछले साठ सालों में हर पार्टी ने इस देश को कई तरह से ठगा है, लेकिन इसके लिये जिस पर जूता चलना चाहिये क्या ये वही लोग हैं। क्या जूते का निशाना सही लोगों पर है। क्या आ़डवाणी, चिदंबरम और नवीन जिन्दल इस कुव्यवस्थाओं के सीधे दोषी हैं। चौरासी के दंगो पर क्या चिदम्बरम पर जूता पड़ना चाहिये? हरियाणा की खराब व्यवस्था के लिये क्या नवीन जिन्दल ज़िम्मेदार हैं ? एमपी में आडवाणी पर जूता चलाने वाले पावस आग्रवाल ने आरोप लगाया है कि आडवाणी नकली लौह पुरुष हैं, क्या इस बात पर आडवाणी को चप्पल मार देनी चाहिये ?
जूता मारना बिल्कुल ठीक है। बिल्कुल जूता मारना चाहिये। लेकिन निशाना तो ठीक कीजिये। कई गंदे सफेदपोश हैं जो फूलों के हार पहन रहे हैं। चिदम्बरम ने जरनैल को माफ कर दिया। आडवाणी और नीवन जिन्दल ने कुछ नहीं कहा सोचिये ये जूता शाहबुद्दीन, पप्पू यादव या डीपी यादव पर चला होता तो क्या वो माफ कर देते। जूता मारने का साहस करने वाले क्या इतने अंधे हो गये हैं कि उन्हैं इन उन्मादी साहस को दिखाने का दूसरा रास्ता नज़र नहीं आ रहा। सम्हाल कर रखिये अपने जूते को और सही निशाना तलाशिये फिर चलाईये......बड़ा कीमती है जूते का निशाना............