Tuesday, May 23, 2017

मेजर गोगोई का मेडल मानवता का सम्मान




9 अप्रेल 2017 की दोपहर ढलनी शुरू हुई ही थी कि 500 लोगों की भीड़ ने पोलिंग पार्टी को घेर लिया। श्रीनगर के बीरवाह का ये वो इलाका था जहां चुनाव के दौरान आर्मी तैनात थी। पोलिंग पार्टी घिर चुकी थी, पत्थरबाज़ों ने अब पेट्रोल बम फेंकने भी शुरू कर दिये। चुनाव आयोग के कर्मचारियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मेजर तिलुल गोगोई पर थी। मेजर तिलुल को अंदाज़ा हो चुका था कि पत्थरबाज़ पूरी कोशिश में थे कि हालात बिगड़ जाएं, गोलीबारी हो और चुनाव की प्रक्रिया बदनाम हो जाय। 
 मेजर तिलुल ने अपनी फोर्स देखी, उनके पास पैलेट गन नहीं थी, सभी जवानों के पास एके-47 रायफल्स थीं। मेजर गोगोई ने आगे बढ़ने की कोशिश की लेकिन दूसरी तरफ से पत्थर और पेट्रोल बम आ रहे थे। पत्थरबाज़ों ने छोटे बच्चों को आगे कर रखा था जिसकी वजह से सेना के जवान पत्थरों से भी जवाब नहीं दे पा रहे थे। अब सेना के सामने एक ही रास्ता बचा था कि गोली चलाई जाय, भीड़ को तितर बितर किया जाय और किसी तरह से पोलिंग पार्टी को बचाकर निकाला जाय। 
सैनिकों को फायरिंग का आदेश देने से पहले मेजर तिलुल बारीकी से आसपास देखते रहे, उनकी ट्रेनिंग में ही ये महान आदर्श स्थापित किया गया था दुश्मन को मारना आखिरी रास्ता है... पहला नहीं। एक बड़ी साज़िश के तहत काम कर रहे पत्थरबाज़ों पर अगर गोली चलती तो पहले उन बच्चों को लगती तो सबसे आगे थे। पूरी बटालियन ये जानती थी कि वो किसी भी सूरत में बच्चों पर गोली नहीं चलानी है। हालात बेकाबू होते जा रहे थे। अगर गोली चलती तो श्रीनगर का वो इलाका खून से लथपथ हो जाता। 
मेजर को एकाएक कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में  कृष्ण का वो वाक्य याद आया जिसमें कहा गया था कि मृत्यु अगर सभ्यता को दूषित होने से बचाती हो उसे हो जाना चाहिए। फौरन बटालियन को हुक्म हुआ पत्थरबाज़ों को खदेड़ो और एक को पकड़ लाओ। फारुख डार अपने दूसरे साथियों के साथ तेज़ी से भाग नहीं सका, उसे पकड़ लिया गया। फारुख डार को जीप के आगे बांधा गया। ईदगाह कहानी में प्रेमचंद्र ने लिखा है कि  कायरों में नीती का साहस और न्याय का बल नहीं होता। यही हुआ फारुख डार को जीप से बंधा देखकर पत्थरबाज़ों की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि जवाब इस अंदाज़ में भी मिल सकता है।  
मेजर तिलुल गोगोई की रणनीति काम आई, एक भी पत्थर नहीं चला तो ज़ाहिर है गोली भी नहीं चलनी थी। सारे पत्थरबाज़ पीछे हट गये। पोलिंग पार्टी को सुरक्षित जगह पर पंहुचाया गया और खिसियासे पत्थरबाज़ अपने घरों को लौट गये। मेजर तिलुल गोगोई ने सैकड़ों लोगों की जान बचा ली। 
ये मौका था सेना और सरकार के लिये उन लोगों का सम्मान करने का जो देश के लिये काम करते हैं। सरकार ने कह भी दिया देश को कोसने वाले तो अखबारों में छाये ही रहते हैं, ये तो एक देशभक्त का सम्मान है। 

दिनेश काण्डपाल,

सीनियर प्रोड्यूसर, इंडिया टीवी 

Friday, March 24, 2017

योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने की पूरी कहानी



योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने की यही कहानी है?

बीजेपी ने जब यूपी के लिये चुनाव प्रचार की रणनीति तय की उसी वक्त तय हो गया कि योगी आदित्यनाथ किस भूमिका मेंआगे बढ़ सकते हैं। बीजेपी की मजबूरी थी कि वो कोई एक नाम आगे नहीं कर सकती थी। बिहार से सबक ले चुके बीजेपी के रणनीतिकार यूपी के लिये कोई भी कमज़ोर कड़ी छोड़ना नहीं चाहते थे। उस वक्त ङभी योगी बड़ा चेहरा तो थे लेकिन विपक्ष उनको आसानी से निशाने पर ले सकता था। योगी को निशाने पर रखकर विरोधी दल इतना शोर कर सकते थे कि बीजेपी का ध्यान भटक जाता। बीजेपी ने जिस लक्ष्य के लिये पिछले दो साल से तैयारियां शुरू कर दी थीं उसके लिये कोई भी चूक इस वक्त खतरनाक हो सकती थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने विरोधियों के पास कोई चेहरा नहीं था, योगी आगे आते तो तुलनाएं शुरु हो सकती थीं। 

किसकी पसंद थे योगी?

ये सवाल 18 मार्च को उस वक्त उठना शुरु हुआ जब योगी ने दिल्ली से लखनऊ के लिये उड़ान भरी। लखनऊ के वीवीआईपी गेस्ट हाउस में वैंकया नायडू और योगी की मुलाकात हुई तो राजनीतिक प्रेक्षक कौतूहल से भर गये। बड़े बड़े पंडित और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपनी बात का भरोसा न होने पर सूत्रों का हवाला लेने वाले रिपोर्टर सकते में आ गये। ये सवाल तो अभी तक नहीं उठा कि योगी को सीएम क्यों बनाया, सबसे बड़ा सवाल तो ये खड़ा हो गया कि योगी को सीएम किसने बनाया। दरअसल  लोकसभा चुनाव में बंपर जीत के बाद से ही बीजेपी के लिये ये ज़रूरी हो गया था कि वो हिंदुत्व के प्रतीकों को आगे बढ़ाने पर गहराई से सोचे। राजनीतिक क्षेत्र के साथ साथ दूसरे सामाजिक क्षेत्रों में भी। केन्द्र सरकार कुछ नियुक्तियों में परेशानी देख चुकी थी, लेकिन एजेंडे से हटने का मतलब होता जनादेश का निरादर करना। योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व का उग्र चेहरा हैं, लेकिन पिछले 6 महीने से शांत है। उनकी बातों में गंभीरता है, किसी रैली का भाषण हो या फिर टेलीविज़न शो का संवाद। योगी संयमित हैं। 
सवाल पर लौटते हैं कि योगी आखिर किसकी पसंद हैं। आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों से जुड़े लोग बताते हैं कि ये योगी आदित्यनाथ साझा रणनीतिक पसंद हैं। योगी को सीएम  बनाने का विचार नागपुर से होकर दिल्ली नहीं आया। बल्कि नागपुर से दिल्ली के केशव कुंज और 7 लोक कल्याण मार्ग से अशोक रोड तक जहां भी भविष्य को लेकर मंथन हुआ वहां योगी फिट होते चले गये। बीजेपी को यूपी में जीत दिख रही थी, ज़ाहिर है नामों पर भी हाईकमान विचार कर ही रही होगी, इसलिये जब नतीजा आया तो दिल्ली में केवल दो लोग मंथन करते दिखे एक थे अमित शाह और दूसरे केशव प्रसाद मौर्य। फैसला तो हो चुका था, जिन्हें ज़रूरत थी उन्हें बता भी दिया गया था। मीडिया और नेताओं के बीच ब्रेकिंग का खेल खेला जा रहा था, अमित शाह ने उसे खेलने दिया।  

योगी को कब बताया गया?

योगी आदित्यनाथ के तेवर दो आवरण लिये हुए थे। पूरे चुनाव के दौरान योगी का एक भी बयान विवादों में नहीं आया। योगी ने सुर तीखे रखे लेकिन शब्दों को संयमित कर लिया। आवाज़ बुलंद रखी लेकिन बातों को विवादों से दूर ही रखा। जो लोग पिछले 6 महीने से योगी को कवर रह रहे हैं वो ये अनुभव कर चुके होंगे की योगी खुद किसी बड़ी योजना की तरफ चल चुके हैं। योगी ने बीजेपी के लिये बतौर स्टार प्रचारक गाज़ियाबाद से लेकर गोरखपुर तक प्रचार किया। बीजेपी के उम्मीदवारों में पीएम मोदी और अमित शाह के बाद योगी सबसे बड़ी पसंद थे, ये संकेत भी पार्टी हाईकमान को बता रहे थे कि यूपी को किसका साथ पसंद हैं। पूरे चुनाव में योगी लगभग हर जगह गये और जमकर गरजे, लेकिन मर्यादा के दायरे में। योगी आदित्यनाथ को तैयार रहने के संकेत दिये जा चुके थे, उन्हें बता दिया गया था कि जीत के लिये मेहनत कीजिये और आगे के नक्शे पर कदम बढ़ाईये। 
योगी को क्यों चुना गया?
जिन लोगों ने योगी आदित्यनाथ की शपथ को ठीक से देखा या सुना है उन्होंने गौर किया होगा कि यूपी के नये सीएम का नाम थोड़ा आगे पीछे हो गया है। हम जानते हैं य़ोगी आदित्यनाथ को लेकिन शपथ के दिन हमारा परिचय हुआ आदित्यनाथ योगी से। संत परंपराओं के देश वाला कोई भी शख्स बता सकता है कि पहले योगी लगता है उसके बाद नाम। यही बड़ी वजह है योगी के चुनाव की। 45 फीसदी ओबीसी, 21 फीसदी दलित और उसके बाद अगड़ी जातियों के पेंच, योगी नाम लगते ही बीजेपी ने उस बड़ी बाधा को पार कर लिया जिस पर उसके विरोधी चारों खाने चित होकर बैठ गये हैं। योगी की कोई जात नहीं है और यूपी में बिना जात के बात नहीं होगी। योगी आदित्यनाथ हिदुत्व का वो छाता है जिसकी छांव में सारे जाति, पंथ बाहर की धूप में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। बीजेपी हाईकमान जानता था कि उसे नया वोटर मिल तो गया लेकिन उसे सहेज कर रखना ज़रूरी है, इसलिये एक बिना जात वाले को आगे कर दिया और उस बंधन से पार पा गये। 
कुल मिलाकर  योगी में बीजेपी बड़ा भविष्य देख रही है और कुछ उत्साही देश का भविष्य भी देखने लगे हैं।  

दिनेश काण्डपाल
सीनियर प्रोड्यूसर, इंडिया टीवी 

Sunday, February 28, 2016

साहस की असली परीक्षा का वक्त आ गया है

मनोहर लाल खट्टर साहब आपके साहस की असली परीक्षा का वक्त आ गया है। हरियाणा में जाट आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के जो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं उन्हें देखकर एक तरफ आंखों से आंसू निकल रहे हैं तो दूसरी तरफ रोंगटे खड़े हो रहे हैं। खट्टर साहब क्या आप इस बात को समझ पा रहे हैं कि जाट आंदोलन के दौरान जिसने भी हिंसा की है उसे सज़ा दिलवाना आपका धर्म है? आप सत्ता में हैं, न्याय के लिये आपको सर्वोच्च स्थान मिला है, और आपको उसका पालन करना ही होगा। तीन दिन तक हरियाणा जलता रहा, आपकी पुलिस सिर पर पैर रखकर भागती रही इस बात का प्रमाणिक वीडियो है मेरे पास। एक दो जगह पुलिस वालों ने भिड़ने की कोशिशें की तो आंदोलनकारी इतनी तैयारी से थे कि पुलिसवाले टिक नहीं सके। सामान्य समझ वाला व्यक्ति भी ये समझ सकता है कि ये आंदोलन पूर्व नियोजित था जिसका एक मात्र मकसद था आपके राज्य में शासन को दो से तीन दिन तक बंधक बना लेना। मुझे इस बात का पूरा शक है कि ये आंदोलन जाटों के आरक्षण के लिये नहीं था बल्कि उसकी आड़ में एक बड़ी साज़िश की जानी थी। वीडियो साफ दिखा रहे हैं कि आंदोलन के नाम पर उपद्रवियों के जत्थे निकल रहे हैं। ट्रेक्टर, जीप, ट्रक कारें, मोटर साइकिल। हर साधन का इस्तेमाल हो रहा है। चुन चुन कर लोगों की दुकानों को आग लगाई जा रही है। रोहतक, अंबाला, झज्जर की तस्वीरें आपके दिल को चीर कर रख देंखी। अगर आपने अभी तक नहीं देखी हैं तो देख लीजिये। आपके लिये देखना ज़रूरी है क्योंकि आपको न्याय करना है। 20 साल हो गये हैं मुझे उत्तराखंड से दिल्ली आये हुए। ये संयोग है कि दिल्ली आते ही हरियाणवी मोहल्ले में रहा और एक दो जाट मेरे अच्छे दोस्त बन गये। बोली का अक्खड़पन तो खलता था लेकिन उसके बाद जाटों के हृद्य में बसा अपार स्नेह सारी शिकायतें दूर भी कर देता था। जो भी जाटों का इतिहास जानता है, या मामूली तौर पर भी उनके बारे में समझ रखता है वो ये कह सकता है कि जो कुछ भी तीन दिन तक हरियाणा में हुआ उसे कम से कम उन जाटों ने नहीं किया जो हरियाणा की पहचान रहे हैं। खट्टर साहब जब आप हरियाणा के मुख्यमंत्री बनाए गये थे तो 80 फीसदी लोग चकित थे। जिन्होंने आपको सीएम के तौर पर स्वीकार किया उन्होंने आपका जीवन देखा था, इसलिये उम्मीद बंधी थी। जिस सादगी के साथ आपने एक स्वयंसेवक बनकर संघ के उद्देश्यों के लिये जीवन समर्पित कर दिया, आज वो उद्देश्य आपको चुनौती दे रहे हैं। हैरान हूं मैं इस बात से कि आपका खूफिया तंत्र किस ढाबे की अफीम खाकर सो रहा है? आपकी पुलिस के अफसर बुक्की मारकर कहां बैठे थे जो इतने बड़े षडयंत्र का पता नहीं लगा सके? मुझे तो इस बात पर शक हो रहा है कि हरियाणा का प्रशासन आपके साथ है या उन षडयंत्रकारियों के साथ जिन्होंने हरियाणा को कलंकित करने की कोशिश की है। क्या आपको दिख नहीं रहा कि जाट आंदोलन के नाम पर जो कुछ भी हुआ वो एक गहरी साज़िश है। अब या तो साज़िश आपके राजनीतिक दुश्मनों ने की है या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि इसमें आपकी भी सहमति रही हो? अब तक जो वीडियो और तथ्य सामने आ रहे हैं उनके आधार पर मैं ये कतई मानने को तैयार नहीं हूं कि एक घटनाएं स्वत: हो गईं। ये घटनाएं हो नहीं गईं बल्कि करवाई गई हैं। अब किसने करवाई ये पता करना आपका काम है। आपकी छवि कड़क नहीं है लेकिन आप हरियाणा की ढाई करोड़ जनता के मुखिया हैं आप...अगर समर्थ नहीं है तो शासन छोड़ दीजिये। आप अपने मंत्रियों के बयानों पर काबू नहीं रख पाते, अपने प्रदेश को जलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई में समर्थ नहीं दिखते तो फिर आप शासन में क्यों हैं। बताईये कि आज जब मैं ये लिख रहा हूं तो आपके अफसर 72 गिरफ्तारियों का रिकॉर्ड दे रहे हैं। जो लोग गिरफ्तार हुए हैं उनका दमखम कुछ नहीं। बड़ी मछलियां आपकी पकड़ से दूर हैं। आपके राज्य में वो कुरुक्षेत्र की धरती आती है जहां धर्म के लिये नहीं न्याय के लिये युद्ध हुआ था। इसी धरती पर एक पीढ़ी खत्म हुई थी और दूसरी परीक्षित । अपने शासन को उदाहरण बना देने का अवसर इतिहास ने आपको दिया है। उठिये चाहे कोई भीष्म खड़ा हो आपके सामने आप अर्जुन बन जाइये। न्याय दीजिये उन लोगों को जिन्होंने तीन दिन तक खाडंवप्रस्थ की अग्नि से भी भीषण ज्वालाएं झेली हैं। उठिये मनोहर लाल खट्टर साहब इंसाफ कीजिए। दिनेश काण्डपाल, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

Friday, April 24, 2015

पाकिस्तान के लिये उम्मीद की किरण

चीनी राष्ट्रपति जिस वक्त पाकिस्तान की संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित कर रहे थे उस वक्त पाकिस्तानी सांसदों के चेहरे पर एक उतावली नज़र आ रही थी। संसद के फ्लोर से तकरीबन आठ फीट ऊपर शी जिनपिंग का आसन था और वहीं पर भाषण देने का स्थान भी। पूरे प्रसारण के दौरान अनुवादक की समझ और समाचार चैनलों पर प्रसारित होने लिखित समाचार ही शि जिनपिंग की बातों को समझ पाने का माध्यम थे। जब भाषा समझ न आ रही हो तो ध्यान भावों पर जाता है। भावों के ज़रिये उन अर्थों को समझने की कोशिश की जाती है जो सीधे संवाद से हासिल न हो पा रहे हों। वहीं इस भाषण के दौरान भी हुआ। पाकिस्तानी सांसदो के चेहरे पर उतावली की वजह समझने के लिये दिमाग पर ज्यादा ज़ोर लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। आमतौर पर भारतीय जनमानस जब पाकिस्तानी शासकों को देखता है तो उसके दिमाग में केवल अविश्वास उत्पन्न होता है और कुछ नहीं। पुरानी पीढ़ी ने 1948, 65 और 71 कीं जंग देखी तो नई पीढ़ी ने करगिल देख लिया। अब जो नौनिहाल हैं वो सीज़फायर के उल्लंघन और सैनिकों के सर काट लेने की खबरों से परिचित होने लगे हैं। चीनी रष्ट्रपति के संबोधन के वक्त जो उतावली पाकिस्तानी सांसदो के चहरों पर नज़र आ रही थी उसमे एक अलग अहसास नज़र आ रहा था। अपने भाषण के दौरान चीनी राष्ट्रपति एक के बाद एक भावनाओं की चाशनी में लपेट कर जलेबियां उतार रहे थे और दूसरी तरफ पाकिस्तानी सांसद याचक भाव से उन्हें विनय पूर्ण तरीके से प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने में लगे थे। तालियां अंतहीन थीं, सो बजती रहीं। इस बार पाकिस्तानी शासकों में एक दूसरी तरह की बेचैनी देखने को मिली। विकास और विस्तार के चीनी मॉडल में पाकिस्तानियों ने अपना उज्जवल भविष्य तलाशने की कोशिशें की हैं। इस बार इन कोशिशों को जो पंख लगे उनमें चीनी ड्रेगन की फुफकार तेज़ है। पाकिस्तान की नई पीढ़ी का एक बड़ा तबका विकास के लिये छटपटा रहा है। वो दुनिया से वाकिफ है, पढ़ा लिखा है और ये समझ रहा है कि तरक्की ही बेड़ा पार लगा सकती है, तालिबान नहीं। उसे इस बात में कोई शक नहीं कि तालिबान एक दिन तरक्की के आगे हारेगा। नौजवानों ने अपनी ताकत चाहे विचारों के ज़रिये हो या भुजाओं के, पूरे दक्षिण एशिया में दिखानी शुरु कर दी है। विकास के लिये बेचैनी है। दुनिया में कुछ कर गुज़रने की चाहत पाकिस्तानी नौजवानों को सही मोड़ दे रही है। इस चाहत का दबाव न सियासतदानों पर भी साफ दिख रहा था जो चीनी राष्ट्रपति का भाषण सुन रहे थे। आये दिन होने वाले बम धमाके, आतंकियों के फिदाईन हमले और उस पर भी पूरी दुनिया के ताने। पाकिस्तान और उसका नौजवान ऊब रहा है। जिस मुल्क में पिछले सात सालों से सुरक्षा की चिंता के चलते कोई विदेशी टीम क्रिकेट खेलने न गई हो, जिस मुल्क में खुलेआम घूम रहे नेताओं पर अमेरिका ईनाम घोषित कर देता हो, जिस मुल्क की फौजी छावनी के बीचों बीच तीन अमेरिकी हैलीकॉप्टर आकर दुनिया के मोस्ट वॉंटेड आतंकी को मार कर उसकी लाश उठा ले जाते हों उस मुल्क के नौजवान की गैरत उसे कचोटती नहीं होगी। कितना फीका पड़ जाता होगा वो जब दुनिया उसे ताने मारती होगी। पेशावर के सौनिक स्कूल में हुए बच्चों के कत्लेआम ने पाकिस्तान को आतंक में फर्क न करने की सख्त चेतावनी दी है। पाकिस्तानी सियासतदान भले ही इन चेतावनियों को नज़र अंदाज़ कर दें लेकिन वहां के लोग इसे समझ चुके हैं। वो अमन चाहते हैं। चीन ने भले ही भारत को घेरने के लिये अपनी बिसात बिछाई हो लेकिन दुनिया भर में पिट चुके पाकिस्तान को चीन ने जो मरहम लगाया है उससे वो न केवल खुद की चोटों के ज़ख्म भर सकता है बल्कि अपने आत्मसम्मान को मिले घाव पर भी पट्टी कर सकता है। ये पाकिस्तान के लिये गर्व का मौका है कि दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था उसे अपना भाई कह रही है। तमाम आतंकी खतरों से परिचित चीन उस देश में 46 बिलियन डॉलर झोंक रहा है, उसे 5 अरब डॉलर की 8 पनडुब्बियां दे रहा है।
पाकिस्तान आज जहां खड़ा है वहां पर चीन ने उसका हाथ पकड़ा है, पूरी दुनिया में डंका बजाकर पकड़ा है। ये हाथ अमेरिका ने उस वक्त पकड़े थे जब वो अपनी महानता के प्रतीक दो टावरों की बलि दे चुका था और उसे पाकिस्तान का इस्तेमाल करना था। इस्तेमाल तो चीन भी करेगा लेकिन यहां पर शर्त दूसरी है। ये भावनात्मक मरहम है, चीन ने पाकिस्तान के सामने कोई धर्म संकट भी खड़ा नहीं किया जैसा कि अमेरिका ने मुशर्रफ के सामने किया था कि तालिबान के खिलाफ लड़ें या नहीं। यमन के खिलाफ सउदी अरब की बात ठुकराकर पाकिस्तान ने जो जोखिम मोल लिया था उसे भी चीनी दोस्ती ने काफी हद तक कम कर दिया है।
पाकिस्तान के घावों पर मरहम लगाकर चीन ने अपने शिंजियागं जैसे मुस्लिम बहुल प्रांत में आये दिन होने वाली हिंसा को भी थामने की कोशिश की है।
ये समझौते पाकिस्तान की किस्मत बदल सकते हैं बशर्ते पाकिस्तान के सियासतदान इसका मोल समझें। संसद भवन के हॉल में याचक मुद्रा में बैठे सांसद अगर वाकई विकास के लिये गंभीर हैं तो उन्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। पाकिस्तान में शांति आ गई तो फायदा भारत को भी हो सकता है।
दिनेश काण्डपाल

A Ray Of Hope For Pakistan

Chinese President Xi Jinping addressed Pakistan’s joint parliamentary session and the expression of eagerness on the faces of Pakistan’s parliamentarians was evident. When the speaker and audience don’t share the same language of communication, the instant medium of communication are expressions and body language. And this speech of Xi Jinping showed how the parliamentarians listened to it eagerly despite of the fact that they had to wait for translation of the speech. It is not very difficult to understand the reason of the interest shown by the Pakistan’s parliamentarians. People in India often have this feeling of mistrust for Pakistani rulers. Indians still have the memories of 1948, 1965 and 1971 war and the Kargil war is still fresh in the minds of people of India. Still we witness the news of ceasefire violations and beheading of Indian soldiers by Pakistan army.
Chinese president Xi Jinping’s speech surely was as expected full of promises and it was welcomed very warmly. Pakistan and China being old allies the expectations of people of Pakistan were natural. Pakistan facing a state of limbo with violence and terrorism, due to its security problems the dates of Xi Jinping’s visit were also not made clear. The visit of the Chinese president happened at a point where Pakistan has shown its interest in development and tackling violence.
In the Chinese model of development and growth Pakistan is looking for hope for itself. Pakistan’s youth is looking towards development, the youth is educated, is wanting to connect with the world and understands that development and not Taliban can be the way ahead. The youth of Pakistan who have been brought up in a country which has been tarred with years of fundamentalism and violence now understands that Taliban can be defeated by development. And the educated Pakistani young men and women are proving themselves in South East Asia and international arena. The urge to make life better in Pakistan now people are having their outlook changed and eventually this change reflected upon the parliamentarians response who were present at the Chinese president Xi Jinping’s address to the joint session of parliament.
Pakistan has not only been afflicted by internal violence, terrorist attacks and suicidal attacks but all this has taken its toll on its reputation internationally. The people are now tired. A country where security is so feeble that in last seven years no international cricket team has agreed to play here, in a country America declares prize money on local leaders, in a country where American marines target the cantonment area to kill and pick up the dead body of world’s most wanted terrorist without informing local administration. The youth of this country must be craving for some self respect. The attack on Peshawar’s school has taught Pakistan to stop differentiating between good and bad Taliban. The government may ignore the lesson but the people of Pakistan seem to have finally arrived to the point where they wish for peace.
Coming to Chinese strategy of encricling India, china here has once again given Pakistan much needed support when it has got aloof internationally. With the renewed Chinese warmth Pakistan can feel a little high in its self esteem. Xi Jinping’s saying, coming to Pakistan was like coming to a brother’s home, was a proud moment for Pakistan. Despite dangerous security threats looming around China has agreed to invest 46 billion dollars and give 8 submarines costing 5 billion dollars.
Pakistan has been listed as one of the most dangerous countries in the world. China decided to hold Pakistan’s hand when it was getting lonelier. From the days when Pakistan was United States of America’s key ally in fighting terrorism after the World Trade Centre attack to the present situation where America has betrayed Pakistan, the country has seen a lot of violence. China will also have Pakistan playing a role in fulfilling its ambition but there always has been an emotional quotient playing in the relations of both the countries.
Pakistan’s denying help to Saudi Arab in the fighting against Yemen rebels had its own fall outs but China’s support has given Pakistan a new confidence.
With Xi Jinping’s visit to Pakistan China also expected to tackle situation of violence in Xinjiang province.
Renewed Chinese support can change Pakistan’s destiny if government understands its importance and use it carefully and constructively. If Pakistan benefits from the Chinese help and bring peace to its people, India will also be a beneficiary of that peace.
Dinesh Kandpal
Kandpal.dinesh@gmail.com

Thursday, April 9, 2015

ये टीवी और ट्विटर की जंग है



विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह के Presstitutes वाले बयान पर मचे बवाल और टीवी चैनलों की बहस में ट्विटर कहीं आगे निकल गया। ट्वीट्स की संख्या के आधार पर जनरल के समर्थक टाइम्स नाउ और अर्णब गोस्वामी पर हर तरह की फब्तियां कसने की छूट लेने लगे। कई उत्साहि ट्वीटिये तो ये दावा करने लगे कि टाइम्स नाउ के एडिटर अरण्ब गोस्वामी ये जंग हार चुके हैं इसलिये उन्हें अब माफी मांग लेगी चाहिये।

दरअसल शुरुआत टाइम्स नाउ ने जनरल वी के सिंह के उस बयान से की जिसमें उन्होंने यमन के रेस्क्यू ऑपरेशन और पाकिस्तानी हाईकमीशन में अपने दौरे की तुलना की। कई जनरल समर्थक प्रेक्षक ये मानते हैं कि वीके सिंह इस बात से आहत थे कि भारत सरकार, नेवी और एयरफोर्स के शानदार  काम को मीडिया तवज्जो नहीं दे रही थी इसलिये ये एक व्यंगात्मक बयान था, लेकिन टाइम्स नाउ ने इस भावार्थ में जाने की कोई ज़रूरत न समझते हुए अपने संपादकीय विवेक का प्रयोग किया। नतीजा हम सबके सामने था। टाइम्स नाउ चैनल और उसके ट्विटर हैंडल से जनरल पर एक के बाद एक वार होने लगे। जनरल साहब पता नहीं कब के खार खाये हुए बैठे थे..सो उन्होंने देखा कि देश का माहौल उनके अनुकूल है, पीएम साहब विदेश जाने वाले हैं, उनके खिलाफ बोलने वाला भवनात्मक रूप से पिट जाएगा इसलिये उन्होंने ट्वीट दाग दिया।

जनरल साहब तो जनरल बने ही इसलिये कि सही मौके पर चोट कर सकें सो उन्होंने कर दी। अब इस बार चोट का निशाना सीधे अर्ण गोस्वामी थे। बाकयादा नाम लेकर ट्वीट किया। जो नहीं भी देखता उसे उकसा दिया। एकदम गाइडेड मिसाइल ट्वीट दागा जनरल साहब ने, सो बवाल मच गया। देखते ही देखते टीवी पर स्पेशल सीरीज के साथ साथ ट्विटर पर भी मोर्चे खुले। जनरल साहब को पता था कि किस मोर्चे पर वो मज़बूती से डटे रहे सकते हैं सो उन्होंने वही मोर्चा खोला।
टीवी पर बयान देने के लिये वो उपलब्ध नहीं थे। जिबूती और सना के बीच में कोई पत्रकार उन्हें दौड़ा नहीं सकता था इसलिये जनरल साहब ने दूर से ही खेल किया। ट्वीट दागा..यहां तो बारूद था ही फट पड़ा...। जनरल साहब का काम बन गया। अर्णब इस बार जनरल के मोर्चे पर फंसते दिखाई दिये। उन्होंने एक हैश टैग शुरु किया, #AbsusiveMinister. ये थोड़ा माइलेज लेने ही वाला था कि जनरल के समर्थन में नया हैशटैग आ गया #HatsOffGeneral..अब लड़ाई के लिये यही मोर्चा सैट हो गया। अर्णब को अपनी टीवी बिरादरी से उतना समर्थन नहीं मिला जिसकी वो उम्मीद कर रहे थे, सो जनरल साहब के समर्थकों का हमला भारी पड़ने लगा। आज दिनांक 9 अप्रेल 2105 की सुबह 11 बजे तक 1 लाख 12 हज़ार से ज्यादा लोग #HatsOffGeneral पर ट्वीट करके वी के सिंह को अपना समर्थन दे चुके थे।

ये लड़ाई चल ही रही थी कि #Presstitutes हैश टैग ने धमाल मचा दिया। इस हैश टैग पर एक नारा वीके सिंह के समर्थन में लगता तो दूसरी गाली मीडिया को पड़ रही थी। जिसके दिल में जो आया उसने वही लिखा। ट्विटर की इस जंग में मीडिया को जितनी गालियां इस बार पड़ी हैं उतनी मैने कभी नहीं देखी। जनरल ने मोर्चा खोला था..वो उसमें विजयी दिखाई देने लगे। बीजेपी पहले ही पल्ला झाड़ चुकी है, प्रधानमंत्री 9 दिन के लिये बाहर हैं वो तो फुटेज खायेंगे ही।

कुल मिलाकर टीवी न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया के बीच कड़ी प्रतिद्वन्दिता की शुरुआता का ये एक बेहतरीन नमूना था। टीवी न्यूज़ चैनल्स ने कई बार ऐजेंडा सैट करके बढ़त लेने की कोशिश की है लेकिन 24 घंटे के अंदर 2 लाख से ज्यादा लोगों का ट्विटर पर समर्थन हासिल करना जनरल वीके सिंह का कौशल ही है।
और एक बात ट्विटर पर पूरी बातचीत के दौरान बात पूरी भारतीय मीडिया की होती रही, किसी ने भी टीवी या अखबार में फर्क नहीं किया और ये भी लिखा की ये मीडिया वाले हमें अब मूर्ख नहीं बना सकते। ये विचार खतरनाक नहीं है?

Tuesday, February 10, 2015

दिल्ली का वट वृक्ष क्यों रोया ????

अहंकारो के पर्वतों को ध्वस्त करके धूल उड़ाता एक परिणाम..आहलादित कर देने का एक अवसर है..अवसर की विवेचना सबके लिये नूतन सी है..एक वो जिनके मस्तक पर वर्षों के तप और संघर्ष से दीप्त हुआ तेज रहता था एकाएक मानो गहन अंधकार और दुर्गंध से भर गया है...वनस्पति विज्ञान में विधा है..कलम लगाने की..ये कलम इसलिये लगाई जाती है कि नये और रचनात्मक रस लिये हुए फल प्राप्त हों..लेकिन उस पर जड़ों में कोई आघात नहीं किया जाता..कलम को पौधें की एक शाख से ही जोड़ा जाता है..यहां तो दिल्ली के वट वृक्ष को बीच से काटकर कलम लगाने की कोशिश की गई..जड़ें तो कभी बुरा नहीं मानती लेकिन ये तने रूठ गये..ऊपर से पानी बरसता रहा लेकिन उसे पहले जड़ें और फिर तने ही तो फूल पत्तियों तक पंहुचाते हैं..सो वो नहीं पंहुचा पाये..पंहुचाना ही नहीं चाहा..उद्यान जिसके निर्देशन में था वो इस संयोग से खुश था कि कोई हल चला गया, किसी ने पानी दे दिया और कोई खाद डाल देगा...गहन कुंभकर्णी नींद..ये निद्रा उस अचेत अवस्था से बुरी थी..जो किसी प्रहार से मूर्छित होने के बाद होती..यहां तो सफलता ने मूर्छित कर दिया..लेकिन प्रकृति का न्याय देखिये..सत्ता का संतुलन हाथों हाथ हो गया..दंभ कभी नहीं टिका..आज क्या टिकता..बरगद की पुरानी जड़ें उन नन्हे कोपलों के लिये आंखों से नीर बहा रही हैं जो कल इस उद्यान में नये वृक्ष बनकर सुगंध फैलाते...लेकिन माली के गलत फैसलों ने वृक्ष पर इतना गहरा प्रहार किया कि जड़, तने सब विश्वास खो बैठे...
इस दंभ ने एक स्वप्न का भी संहार कर दिया...और अब वर्षों से चले आ रहे यज्ञ में स्वयं विध्वंस की आज्ञा सी दे दी। उन स्थानो का भाग्य सदा अश्रु बहाने के लिये होता है...ये इतिहास में पढ़ा था..अब भोग कर साक्षी बन रहे हैं...कुछ कुछ द्वापर युग के महाभारत का स्मरण हो जाता है..जब द्यूत में अहं युद्धिष्ठिर की बुद्धि को भ्रमित कर बैठा और उसने द्रोपदी को दांव पर लगा दिया...फिर क्या था..ले आये दु:शासन द्रौपदी को भरी सभा में..प्रजाजनों ने भी आनंद सा ही लिया...कौन क्या करता...अपराध धर्मराज ने किया था...बांसुरी वाले मोहन आये और अपना कर्तव्य पूरा कर गये...
कहानी तो इससे आगे भी है...आपको पता भी होगा...लेकिन ये बालुकामय पुलिन..उड़ उड़ कर आंखों पर पड़ते रहे..राजा प्रजा सब इससे पार पाने का कोई उपाय न खोज सके..हाथों में मिर्च लिये द्यूत अट्टाहस करता रहा..प्रजा आनंद प्राप्त करती रही...बादलों के बीच नगर बसाने की कल्पना से भला कौन अपना तप नहीं छोड़ देगा...धरातल का कोई मोल नहीं था, बादलों का महल किसे नहीं चाहिये...सो वो मिल रहा था...कल्पनाओं के सागर में हिलोरें ले रही प्रजा को ..द्यूत ने पलटने का मौका नहीं दिया..द्यूत मौका देता भी नहीं है...सो परिणाम आ गया..
अब राजा प्रजा से खफा है...अपने मंत्रियों से भी..वो सोने की तैयारी तो नहीं कर रहा?